प्राचीन परिवेश में शिल्प और जनजीवन का उपन्यास
फिर एक नई फूल-डाली बनाएँ
कू वूजी · AI सृजन · 8294 अक्षर · लगभग 11 मिनट
छठे महीने की पंद्रह तारीख़ को गू छिंग की उँगलियों के बीच कमल की पहली पंखुड़ी खुली। वह लाल नहीं थी, चाँदनी जैसे पानी की रंगत की थी। नोक पर हल्का ख़ुबानी रंग था और किनारे पर दो तहें पूरी तरह दबाई नहीं गई थीं। शन सू ने देखकर कहा कि रंग बहुत फीका है। गू छिंग उसे उजाले में ले गई, फिर छाँह में वापस लाई और बोली कि नाव से देखे उस फूल की रंगत रोशनी के ज़रा हिलते ही बदल जाती थी। उसने उस पल की रंगत बनाई थी जब रोशनी हट गई थी।
दादी ने कुछ देर सोचा और अपने धूसर कमल की बात पर बहस नहीं की। उन्होंने मोटे धागे का गोला फूल के बीच रखकर देखा। गू छिंग को वहाँ ज़्यादा खाली जगह छोड़ते देख उँगली से ज़रा-सा और धागा जोड़ दिया। फूल का आकार तुरंत भर गया। दोनों ने फिर देखा। आख़िर गू छिंग ने जोड़ा हुआ आधा निकाल दिया। शन सू बुदबुदाईं कि इसे हर चीज़ खोलना इतना क्यों पसंद है, मगर हँसते हुए निकला हुआ धागा छोटी फिरकी पर वापस लपेटने लगीं। अपनी बात न माने जाने पर भी उन्होंने काम नहीं छोड़ा।
श्याओ मान दोपहर बाद टोपी की दो किनारियाँ लेकर आई। देखना चाहती थी कि कमल के पत्ते का बस एक घुमाव लेकर काम चल सकता है या नहीं। गू छिंग ने पूरा पत्ता फैलाया। श्याओ मान ने उसका एक पहलू भीतर मोड़ा तो वह पत्ता नहीं रहा, हवा के अभी-अभी उठे झोंके जैसा लगने लगा। गू छिंग को वह मोड़ अच्छा लगा, मगर अपनी साबुत कमल-पंखुड़ी को उसी तरह मोड़ने का मन नहीं था। दोनों ने अपना-अपना नमूना बनाया और तैयार नमूने अगल-बगल रखे। श्याओ मान ने अपना चुना, गू छिंग ने भी अपना। इतने समय साथ काम करने से दोनों के हाथ एक जैसे नहीं हो गए थे।
दोनों ने शेन सु से चुनने को कहा। दादी को पंखुड़ियाँ उधेड़ने से बचा धूसर-हरा गुच्छा पसंद आया, जो फूल बन ही नहीं पाया था। बोलीं, यह मेरी टोपी के किनारे अच्छा लगेगा। गु छिंग ज़ोर से हँसी और पूछा कि जब सचमुच उनकी राय माँगी जाती है, तो वे साथ क्यों नहीं देतीं। दादी ने कहा कि उम्र हो गई है, अब वह बस वही देखना चाहती हैं जो उन्हें पसंद है। उन्होंने सचमुच वह गुच्छा उठा लिया, दो फेरे धागा लपेटकर टोपी पर लगा लिया। उसकी शक्ल न फूल जैसी थी, न पत्ते जैसी। तीनों बहुत देर तक काँसे के आईने के इर्द-गिर्द उसे देखती रहीं। श्याओमान ने कहा कि बिना छीली फली जैसा लगता है। दादी ने जवाब दिया कि फली भी अच्छी है, उससे खाने को तो मिलता है।
गु छिंग ने पूरा कमल एक पंखा बनाने वाले ग्राहक को दिखाया। उसे गर्मियों के पंखों के साथ लगाने के लिए कुछ चाहिए था और फूल बहुत बड़ा नहीं चाहता था। उसने उलटे श्याओमान की वह सादी, मुड़ी हुई पत्ती चुनी और पूछा कि क्या दो जोड़ियाँ बन सकती हैं। गु छिंग ने उसकी बात श्याओमान तक पहुँचा दी। यह नहीं कहा कि उसके अपने फूल में ज़्यादा मेहनत लगी है और पहले उसे चुना जाना चाहिए। ग्राहक गया तो उसके मन में अब भी थोड़ी कसक थी। उसने फूल को उलट-पलटकर देखा और आख़िर अपनी खिड़की के पास उथली तश्तरी में रख दिया। उसने मान लिया कि कम-से-कम अभी उसे सबसे ज़्यादा मन ख़ुद ही इसे रखने का था।
उसका और श्याओ मान का साथ काम करना अब रोज़ नहीं होता था। उधर टोपी की दुकान के घंटे थे, इधर फूलों की दुकान और छिटपुट ग्राहकों के दिन; नमूने साझा इस्तेमाल करने हों तो साफ लिख लेते, बाकी अपना काम करते। किसी फंदे पर अब भी बहस हो जाती। एक बार गू छिंग माप बताना भूल गई, तो दोबारा बनाने का खर्च उसने खुद दिया। शेन सू को उनके लिए रोज़ तीन लोगों का खाना नहीं बनाना पड़ता था। श्याओ मान भोजन के समय मौजूद होती तो एक कटोरा और रख देते; न होती तो गू छिंग नहीं पूछती कि साथ क्यों नहीं खाया।
सातवें महीने में उमस बहुत थी। मेई के पत्तों के नीचे की नाली अब भी देखनी पड़ती थी। पेड़ के पत्तों का एक छोटा हिस्सा फिर कीड़े ने कुतर दिया था। च्यो शन आकर देख गया और हमेशा की तरह पेड़ देखने की फ़ीस ले गया। वन परिवार के आँगन में नमूने दिखाने का मचान हटा दिया गया था। उसकी जगह कुछ समय के लिए खाली पेटियाँ रखी जाती थीं, ऐसे कि न जड़ें दबें, न पानी का रास्ता बंद हो। गू छिंग कुएँ के पास से उधर देखती तो कभी मंग जी नए रंग पहुँचाती दिखाई देतीं, कभी बस आछुन खाली टोकरी लिए निकल जाता। अब वह हर बार दूसरे के माल की तश्तरी को मन की तराज़ू पर नहीं चढ़ाती थी।
दक्षिणी सड़क की छातों की दुकान उसकी कल्पना से ज़्यादा व्यस्त थी। वह बैठने जाती तो अक्सर ग्राहकों की वजह से दरवाज़े के बाहर रह जाती। चोउ जीफिंग भी हर बार हाथ का काम छोड़कर उसके साथ नहीं बैठ सकता था। एक बार वह इंतज़ार से झुँझलाकर मुड़ी ही थी कि वह पीछे आया और बोला, अंदर की छोटी चौकी तो वहीं है। उसने झाँककर देखा, चौकी पर नए छातों का काग़ज़ भरा था। दोनों एक साथ हँस पड़े। उसने एक कोना ख़ाली किया और गू छिंग वहाँ बैठकर अपनी आस्तीन का मुहाना सीने लगी। उसने उसके लिए पूरी दोपहर मुफ़्त में काम नहीं किया, और इंतज़ार करने की वजह से उससे दुकान जल्दी बंद करने को भी नहीं कहा।
बाद में वह गर्मियों की छाँह देखने उसके घर आया। शन सू ने जान-बूझकर फलियों जैसी धूसर-हरी गठरी निकाली और पूछा कि क्या छतरी की नोक पर भी ऐसी एक बाँध सकता है। चोउ जीपिंग ने कहा कि हाँ, पहले बताइए कि फली का दाना कैसा होता है। उसकी संजीदगी ने दादी को निरुत्तर कर दिया। गू छिंग इतनी हँसी कि कैंची थामे उसका हाथ भी काँपने लगा। उसने गू छिंग के हाथ से कैंची ली और ऐसी जगह रख दी जहाँ किसी को लगे नहीं। उसकी हँसी थमी, तभी फिर उसे थमाई। इतनी-सी नज़दीकी पर दोनों ने आने वाली हर गर्मी एक-दूसरे को देने का वादा नहीं किया। उनके हाथ पहले ही जान गए थे कि एक सँकरी मेज़ पर कैसे एक-दूसरे को जगह दें।
उस सफ़र के बाद दिन हमेशा खुले हाथ के नहीं हो गए। पतझड़ में दो बार लगातार बारिश हुई तो साधारण फूलों की बिक्री कम हो गई। गू छिंग ने आपात के लिए रखे पैसों में से कुछ इस्तेमाल किए, फिर महीने के अंत में वापस रख दिए। दादी को आँखों के सामने बारीक सुई अब भी साफ़ नहीं दिखती थी, और ठंड में घुटने का दर्द भी बढ़ जाता था। अब वे अगले सफ़र को किसी पक्के आने वाले खुशहाल साल के भरोसे नहीं छोड़ती थीं। बस पास की उन जगहों की बात करतीं जहाँ जाना चाहती थीं। जिस दिन पाँव और मौसम दोनों साथ देते, थोड़ा-सा चल आतीं।
उसी साल ग्यारहवें महीने की छब्बीस तारीख़ को मेई फिर खिला। पूरा पेड़ नहीं खिला था। गोदाम की ओर की एक टहनी पर फूल कम थे, उलटे खिड़की से दिखने वाली पतली फुनगी पर घने थे। गू छिंग भोर में पानी लेने आई और कुएँ की जगत के पास खड़ी होकर इस साल के फूलों का रंग पहचानने लगी। उँगलियों पर पिछली रात डंडी लपेटने का हल्का कलफ़ अब भी लगा था। दीवार के घुमाव को एक साल हो गया था। गारे के जोड़ों में थोड़ी हरियाली उग आई थी, मगर तना अब भी वहीं था। किसी के एक बार दूर का सफ़र कर आने से उसने अपनी जगह नहीं बदली थी।
वह नया रेशम लेने कमरे में लौटी। खिड़की के कोने में पहली पुरानी मेई की टहनी कागज़ के खाने से तिरछी बाहर निकली हुई थी। पंखुड़ियों की नोकें पीली पड़ गई थीं और उनकी बारीक गुलाबी आभा लगभग मिट चुकी थी। डंठल पर धागे का वह घेरा सफ़र पर निकलने से ठीक पहले कसकर लपेटा गया था। उसने हाथ बढ़ाकर धूल झाड़ी, फिर से गुलाबी रंग नहीं चढ़ाया। पास में गर्मियों में बनाए चाँदनी-पानी के कमल पर भी थोड़ी धूल थी। शेन सु का धूसर कमल एक और डिब्बी में रखा था। उसने तीनों पुराने फूल ऐसे सजाकर नहीं रखे थे जैसे उस साल उसने बस तीन ही काम ठीक किए हों। बस किसी को भी फेंकने का मन नहीं होता था।
दादी उठ चुकी थीं और घुटनों की पट्टियाँ बाँधे बाँस के परदे के पास बैठी थीं। उन्होंने पूछा, क्या वह फिर सफ़ेद मेइ का फूल बनाएगी? अलमारी में कुछ साल पहले का लाल कपड़ा रखा है। गू छिंग ने कहा, पहले आज वाली डाल बनाएगी, लाल रंग अगली बार आज़माएगी। खिड़की के पास जगह बदल-बदलकर देखने पर उसे एहसास हुआ कि ग्यारहवें महीने की शुरुआत में बनाए उसके फूल की कलियाँ इतनी बड़ी थीं मानो सारी एक साथ खिल जाना चाहती हों। सामने की असली डाल पर कहीं कलियाँ छितरी थीं, कहीं सटी हुईं। उन्हें गू छिंग के नियम के हिसाब से सिमटने की कोई परवाह नहीं थी।
उसने तीन कलियाँ घटाकर एक जगह ख़ाली छोड़ी। वह न श्याओमान का टेढ़ा फूल था, न शन सू का पुराने ढंग से मोड़ा किनारा। वह इस साल का यह पेड़ था, इस साल की हवा के बीच। उसने जल्दी नहीं की। पहले उजाले में देखा, फिर छाँव में। पतली पंखुड़ियों पर रंग चढ़ते ही उन्हें सूखने दिया, कलफ़ सूखने से पहले उन्हें खड़ा करने की जल्दी नहीं की। दादी ने दो डंठलों पर धागा लपेटा, हाथ ठंडे पड़े तो काम समेटकर छन परिवार के घर चली गई, यह सुनने कि पिछली रात किसके घर की बिल्ली छप्पर पर चढ़ गई थी। जाते वक़्त उसने नहीं पूछा कि दोपहर का खाना कब तक बनेगा।
गु छिंग घर पर अकेली थी। दोपहर बाद एक ग्राहक आया। यह वही खरीदार था जिसने पिछले साल पश्चिमी बाज़ार में सुगंध के बारे में पूछा था। उसे गु छिंग याद थी या नहीं, कहना मुश्किल था। उसने बस इतना कहा कि सुना है यहाँ कोई रेशमी फूल बनाता है। उत्तर की खिड़की के पास रखने के लिए उसे दो टहनियाँ चाहिए थीं, ताकि सर्दियों में वहाँ थोड़ी चमक रहे। गु छिंग ने उसे पुरानी मेई की टहनी दिखाकर बताया कि साल भर रखने पर रंग ऐसा हो गया है। नए फूल कुछ चमकीले होंगे और समय के साथ उनका रंग भी उतरेगा। ग्राहक ने पास झुककर सूँघा और पूछा कि क्या इनमें ज़रा भी सुगंध नहीं है।
उसने कहा कि ख़ुशबू नहीं है। अगर ख़ुशबू चाहिए तो सुगंध की थैली अलग रख लें, रेशम पर दबाकर नहीं। वह इस बात की ख़ातिर ग्राहक को पेड़ के नीचे नहीं ले गई कि पेड़ की गंध से फूल की गवाही दिलाए। ग्राहक ने उलटे कहा कि यही ठीक है। घर में किसी को तेज़ गंध से खाँसी आती है। पुराने मेइ के आकार का बना देना काफ़ी है, हर कली उतनी भरी होने की ज़रूरत नहीं। गू छिंग ने काग़ज़ लेकर दो फूल लिखे, अठारह वन प्रति फूल बताए और तीन दिन बाद की बात पक्की की। उसने उस फूल को तैयार माल बताकर नहीं दिया जो अभी सूखा भी नहीं था।
ग्राहक चला गया। वह पानी उठाकर कुएँ के पास गई, तभी मेई के फूलों की हल्की-सी महक आई। वह पूरे कमरे में फैली रहने वाली महक नहीं थी, न ही हमेशा आती थी। हवा का रुख बदलते ही हल्की पड़ जाती थी। वहीं खड़ी उसने एक पंखुड़ी को गीले पत्थर पर गिरते देखा और उसे वह कैंची याद आई जो चाँदनी में हवा के बीच तक उठ गई थी। अब वही कैंची उसके हाथ के पास बस धागा काटती थी। दादी लौटीं तो खट्टी मेई की छोटी पुड़िया साथ लाईं। उसे खड़ा देखकर उन्होंने जल्दी काम पर लौटने को नहीं कहा। खुद हाथ बढ़ाकर पानी थाम लिया।
साँझ को झोउ जीपिंग उधार ली हुई लकड़ी की चिमटी लौटाने आया। साथ में कोई और भेंट नहीं लाया। गु छिंग ने उसे खिड़की के पास बुलाया कि इस साल की नई टहनी दिखाए। उसने पहले पुरानी टहनी देखी, बाद में बाँधा गया धागे का घेरा पहचान लिया और कहा कि पुरानी अभी भी खड़ी है। गु छिंग ने कहा कि खड़ी है तो रहेगी, वह उसे सजाकर जवान नहीं दिखाएगी। वह हँसा और एक टेढ़ी पंखुड़ी सीधी करने को हाथ बढ़ाया। गु छिंग ने उसका हाथ थपकी देकर हटा दिया और कहा पहले धो लो, उँगलियों पर अभी तेल लगा है।
वह कुएँ के पास हाथ धोने गया। दादी वहीं पानी निकाल रही थीं। पता नहीं दोनों ने क्या कहा, साथ हँस पड़े। गु छिंग ने खिड़की से अपनी आधी मेज़, कई बार धुला तसला और घुमावदार दीवार के उस पार आलूबुखारे की डाल का टुकड़ा देखा। अचानक उसका मन इस साल के लिए एक मुकम्मल “अच्छा” कहने का नहीं रहा। उसने नई शाखा का आख़िरी धागा नीचे के आधार में समेट दिया, इतना ढील-कसाव छोड़ा कि ज़ोर से न जकड़े, फिर काग़ज़ के खाने में रख दिया कि कल दोबारा जाँचेगी।
शन सू पानी लेकर भीतर आईं और पूछा कि अगले साल भी कमल देखने जाएँगी क्या। गू छिंग ने सिर उठाया। दादी खुद पहले हँस पड़ीं। कहने लगीं कि फिर उतनी दूर थोड़े ही जाना है। पहले देखेंगे कि लूवान में कमल लगाए हैं या नहीं। अगर पैदल चलना मुश्किल हुआ तो गाड़ी में बैठकर भी पानी देख सकते हैं। गू छिंग ने कहा कि वसंत आने पर पहले पूछ लेंगी। उसने उस बात को किसी ऐसे ऑर्डर में नहीं बदला जिसे हर हाल में पूरा करना हो। दादी बैठ गईं, एक खट्टा आलूबुखारा उठाकर उसे दिया और बाकियों को खुद धीरे-धीरे चूसती रहीं।
खिड़की पूरी बंद नहीं थी। झोउ जीपिंग ने आँगन में गीले हाथ झटककर सुखाए और भीतर आकर उसके लिए ऊँचा ढाँचा थोड़ा नीचे कर दिया। रेशम की पहली पुरानी मेई खिड़की के कोने में रही और नई डंडी काग़ज़ के खाने में चुपचाप पड़ी थी। हवा दीवार के ऊपर असली मेई के फूलों के बीच से गुज़री और गू छिंग की उँगलियों के पास से छूती हुई निकल गई। उसने सिर झुकाकर धागे का ढीला सिरा फिर भीतर छिपा दिया। खिड़की बंद नहीं की।
· पूरा पाठ समाप्त ·
यह पुस्तक AI की सहायता से मौलिक रूप में लिखी गई है और वांग आनशी की 《梅花》(प्लम के फूल) तथा इस वेबसाइट की मूल लघुकथा 《不卖春风》(वसंत की हवा बिक्री के लिए नहीं) का विस्तार है। पात्र, व्यापार, भूगोल और कालगणना सभी काल्पनिक हैं; यह कवि की जीवनी नहीं है। मूल रचना में पेड़ बचाने, रेशमी फूलों में सुगंध न होने और दादा-दादी तथा पोते-पोती की दो पीढ़ियों के कमल देखने के केंद्रीय चुनाव बनाए रखे गए हैं।
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