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हाथ में एक ग्रंथ

प्राचीन परिवेश में शिल्प और जनजीवन का उपन्यास

जलमार्ग का पहला पड़ाव

कू वूजी · AI सृजन · 8691 अक्षर · लगभग 12 मिनट

जब नाव युनचिन से छूटी, गू छिंग नमक की छोटी थैली ढूँढ़ रही थी। उसने उसे ऐसी सुविधाजनक जगह रखा था कि अब हाथ ही नहीं पड़ रही थी। उसने झुककर सूखे कपड़ों की दो तहें उठाईं, तभी उसके नीचे अचानक एक झटका लगा। जब उसने सिर उठाया तो किनारे पर काँवर ढोने वाले लोग सिमटकर एक कतार भर रह गए थे और नाव और घाट के बीच चमकीले सलेटी पानी की एक पट्टी खुल गई थी। उसने आख़िरी रस्सी खुलते नहीं देखी। मानो उस दिन का सबसे अहम दरवाज़ा उसके सिर झुकाए रहने के दौरान अपने आप खुल गया हो।

शन सू केबिन की देहरी थामकर किनारा देख रही थीं। उन्होंने गू छिंग को जल्दी नहीं की। छन चाची उन्हें विदा कर पहले ही कपड़े धोने लौट गई थीं और झोउ जीपिंग भी बस गली के मुहाने तक आया था। किनारे पर कोई खड़ा होकर उसकी ओर हाथ नहीं हिला रहा था। गू छिंग को पहले थोड़ा खाली-खाली लगा। जब उसने देखा कि पश्चिमी नगरद्वार के पीछे की धूसर खपरैलों की झलक अब पीछे जा चुकी है, तभी उसे एहसास हुआ कि उसे किसी की ओर पलटकर जवाब नहीं देना है। उसने नमक की पुड़िया वापस उसी जगह खोंसी और दादी के पास बैठकर नाव पर बार-बार पड़ती पानी की थपकियाँ सुनने लगी।

पाँचवें महीने की बारह तारीख़ की हवा ठंडी नहीं थी, फिर भी चेहरे पर पड़ती तो आँगन की हवा से अलग लगती थी। दीवार के कोने से मुड़े बिना सीधे चली आती थी। नाव में कंघियाँ बेचने वाले पति-पत्नी, बुनाई का सामान लेकर मायके लौटती एक स्त्री और नानफू में रिश्तेदारों के पास जाते दो लड़के थे। सबसे ज़्यादा शोर बाँस के पिंजरे में बंद एक हंस मचा रहा था। कंघी बेचने वाला आदमी हर बार वहाँ से गुज़रते हुए बचता था, मगर हंस ख़ास तौर पर गर्दन निकालकर उसी के पीछे लपकता। शन सू को देखकर हँसी रोकनी पड़ी। गु छिंग को पहले डर था कि बूढ़ी को चोंच न मार दे। नाव चलाने वाले ने पिंजरा पीछे कर दिया, तब वह भी निश्चिंत हुई।

उन्होंने जाने के सफ़र के बाकी एक सौ साठ वेन चुका दिए। उनका बिछौना अंदर की तरफ़ था, जहाँ हाथ बढ़ाकर नई कीलों से मज़बूत किया गया लकड़ी का खंभा पकड़ा जा सकता था। गु छिंग ने पाँव रखने की चौकी नीचे रखी। दादी ठीक से बैठीं और घुटने की पट्टी की बाहरी तह कुछ ढीली कर दी। वे उसे हर समय कसकर नहीं रखना चाहती थीं। केबिन में सीली लकड़ी और उबली फलियों की गंध थी, जो कुछ ख़ास अच्छी नहीं थी। गु छिंग को घर के फूलों वाला सूखा काग़ज़ याद आया। एकाएक उसका मन हुआ कि खिड़की और खोल दे, पर वह सँकरी खिड़की पहले ही पूरी खुली थी।

पहला खाना हड़बड़ी में खाया गया। नाव एक छोटे घाट पर रुकी। किनारे शोरबा बिक रहा था और नाववाला बस आधी घड़ी रुकने वाला था। गू छिंग दो कटोरे ख़रीद लाई। कटोरे दुकानदार से उधार लिए थे, खाकर लौटाने थे। देर होने के डर से उसने इतना गरम घूँट लिया कि जीभ की नोक सुन्न हो गई। शन सू इत्मीनान से खा रही थीं। उन्होंने शोरबे से टोफ़ू का एक टुकड़ा निकालकर पहले ठंडा होने को रखा और पूछा, इतनी जल्दी किस बात की है, आधी घड़ी को भी चबाकर थोड़े ही निगलना है। आख़िर गू छिंग ने पहले खाया और दादी की ओर से भी कटोरा किनारे लौटा आई।

रात में तख़्ते घर के तख़्तों से सख़्त लगे। करवट बदलते तो अपने कपड़े की सरसराहट तक सुनाई देती। कोई खर्राटे ले रहा था, कोई अधनींद में बच्चे को पुकार रहा था, लेकिन हंस की एक आवाज़ नहीं निकली। गू छिंग तीन बार जागी और हर बार पहले हाथ बढ़ाकर टटोला कि दादी वहीं हैं या नहीं। तीसरी बार दादी ने सीधे उसका हाथ पकड़ लिया। “तुम्हारा हाथ ठंडा है।” गू छिंग ने हाथ खींचा तो दादी ने उसे अपनी रज़ाई के ऊपर रख लिया और कहा कि अब से उन्हें टटोल-टटोलकर वक़्त का अंदाज़ा न लगाए।

तेरह तारीख को नाव शिश्येन रुकी। लुओ यी की नई दुकान घाट से दूर नहीं थी। गु छिंग ने नाव के किनारे खड़े होकर उसके झंडे का रंग देखा, मगर गई नहीं। नाव सिर्फ़ माल उतारने रुकी थी और दादी भी पिछली रात पूरी नहीं सोई थीं। उसे लगा था कि मन में कसक होगी, मगर पानी का मोड़ आया और मकानों की कतार ने दुकान ढक दी, तो भीतर कोई बड़ी हलचल नहीं हुई। पास की कंघियाँ बेचने वाली स्त्री ने कहा कि उस दुकान का श्रृंगार-चूर्ण सुगंधित है, वह खरीद चुकी है। गु छिंग ने सिर्फ़ कहा कि फूल भी युनजिन में बनते हैं; यह बताना ज़रूरी नहीं था कि किन हाथों से बने हैं।

दोपहर बाद नाव खुले पानी में पहुँची और दोनों किनारे अचानक दूर हो गए। शन सू केबिन के मुँह पर टिकी बहुत देर तक कुछ नहीं बोलीं। गू छिंग ने पूछा कि थक गई हैं क्या। उन्होंने सिर हिलाया, फिर कुछ देर बाद कहा, “अच्छा, चलते रहो तो पानी और फैल जाता है।”

गू छिंग कहना चाहती थी कि अभी भी तो यह नदी ही थी, बात इतनी सीधी कहाँ है। मगर दादी का आधा चेहरा पानी की चमक से उजला देखकर उसने बात निगल ली। उसने खुद भी कभी इस वक़्त, इस जगह से, पानी का ऐसा फैलाव नहीं देखा था जिसे फ़ौरन पार कर लेने की कोई ज़रूरत न हो। किनारे के कुछ पेड़ जैसे हवा के धक्के से धीरे-धीरे पीछे खिसक रहे थे, मगर नाव उतनी तेज़ नहीं चल रही थी जितना उसने सोचा था। वह भी देखती रही, जब तक उस झिलमिलाहट से उसकी आँखें दुखने नहीं लगीं।

उस दोपहर थोड़ी देर अनुकूल हवा चली। नाव के बग़ल की परछाइयाँ पानी में घुलकर बिखर गईं। शन सु को जाने कहाँ से एक धुन याद आई और उन्होंने हल्के से दो सुर गुनगुनाए। गु छिंग को जानी-पहचानी लगी। पूछा, क्या यह वही है जो पहले चूल्हे के पास गाती थीं। दादी बोलीं कि उन्होंने कभी नहीं गाई, उन्हें तो सुर ही नहीं आते। मगर गु छिंग को एक पंक्ति याद थी। उसने धुन आगे बढ़ाने की कोशिश की और सुर इतने दूर भटक गए कि नाव के कमरे में बैठे लोग मुड़कर देखने लगे। वह तुरंत रुक गई। शन सु को जैसे अब जाकर कुछ पहचान में आया। बोलीं, ऐसे नहीं, पहला सुर नीचे से उठता है।

दोनों बड़ी देर तक एक-दूसरे की धुन सुधारती रहीं। धुन तो वापस नहीं मिली, मगर दोनों ने एक-दूसरे के चेहरे पर साफ़ देख लिया कि कोई मानने को तैयार नहीं था कि उसने ग़लत गाया। आख़िर शन सू ने हँसकर कहा कि जाने दो, हवा सुन भी लेगी तो दूसरी पंक्ति माँगने नहीं आएगी। गू छिंग ने केबिन से बाहर हाथ बढ़ाया, कुछ देर हवा को अपनी हथेली थामने दी, फिर हाथ खींच लिया। किसी अधूरे काम को बीच में छोड़कर भी उसे किसी के प्रति अपना बक़ाया महसूस न हो, ऐसा कम ही होता था। इस वक़्त तो वह बस बुज़ुर्ग को एक बार और गुनगुनाते सुनना चाहती थी, ग़लत सुर में भी चलेगा।

उसी केबिन में करघे के पुर्जे लेकर सफ़र कर रही स्त्री उनके पास आ बैठी और उसने शन सू से पूछा कि क्या वह नानपू की रहने वाली है। बुज़ुर्ग ने पहले लगभग फिर से सिर हिला ही दिया था, होंठ ज़रा हिले, फिर बोली कि नहीं, पहली बार जा रही है। स्त्री ने ‘अच्छा’ कहा और बताने लगी कि किस घाट पर कम किराया लगता है और किस नदी के मुहाने पर मच्छर ज़्यादा हैं। इस वजह से उसने शन सू को कमतर नहीं समझा। गू छिंग ने “头一回” यानी ‘पहली बार’ के वे तीन चीनी अक्षर सुने, सिर झुकाकर दादी के कपड़े का हवा में उड़ता कोना दबाया, और उसके होंठों पर हल्की-सी मुस्कान उभर आई जिसे वह छिपा नहीं सकी।

चौदह की सुबह नाव से उतरते वक्त शेन सु का घुटना अकड़ गया। उतरने का तख्ता पार करने से पहले वे खंभा पकड़कर काफ़ी देर खड़ी रहीं। गु छिंग पहले किनारे पर उतरी और उनकी ओर हाथ बढ़ाया। दादी तख्ते के बीच पहुँचीं तो नीचे पानी चमकता हुआ डोल रहा था। वे अचानक रुक गईं। पीछे लोग इंतज़ार में थे। गु छिंग का जी हुआ जल्दी करने को कहे, मगर नाव चलाने वाली औरत ने हाथ उठाकर पीछे वालों को रोक लिया और शेन सु से कहा कि किनारे की लकड़ी की खूंटी देखो, नीचे मत देखो। शेन सु ने नज़र उस एक बिंदु पर टिकाई और आखिर दूसरा पैर भी आगे ले आईं।

किनारे पहुँचकर बुज़ुर्ग का माथा पसीने से तर था। गू छिंग पूछना चाहती थी कि क्या उसे आने का पछतावा है। फिर देखा कि दादी का दाहिना हाथ अब भी उसे पकड़े था, तो उसने अभी नहीं पूछा। दोनों खाने की छोटी छतरी के नीचे जाकर बैठीं। दादी ने बस आधा कटोरा दलिया खाया। आती-जाती नावों को देर तक देखकर बोली कि आज उस डगमगाते पटरे पर फिर नहीं चढ़ना चाहती। गू छिंग ने देखा कि उनकी नाव की रस्सी खुलने ही वाली थी। उसे नानपू तक पहुँचने के छह दिन याद आए। उसके पाँव की नोक घाट की तरफ़ ज़रा-सी बढ़ी, फिर लौट आई।

उन्होंने लूदू में सामान उतारा और अपनी मर्ज़ी से एक रात ठहर गईं। पहली नाव उनके लिए नहीं रुकती। आगे दूसरी नाव लेने पर कुछ ज़्यादा किराया लगता था। गू छिंग ने पहले से पूछे हुए नियम के मुताबिक़ चुका दिया और नाविक से यह बहस नहीं की कि एक टिकट पर दुनिया भर की सैर होनी चाहिए। नाव चली तो हंस फिर बोलने लगा, लंबी गर्दन पिंजरे के किनारे से बाहर निकली और कंघियाँ बेचने वाली स्त्री ने उनकी ओर हाथ हिलाया। शन सू किनारे पर बैठी देखती रहीं, फिर अचानक गू छिंग से बोलीं, “इसकी हिम्मत तो मुझसे ज़्यादा है।”

वह हंस की बात कर रही थीं। गू छिंग इतनी हँसी कि लपेटी हुई रज़ाई लगभग हाथ से गिर गई। दादी भी हँसीं और फिर लंबी साँस छोड़कर बोलीं कि आख़िर पैरों के नीचे पानी नहीं है। उन्हें उस छोटे घाट से कोई ख़ास लगाव नहीं था, बस वहाँ स्थिर होकर बैठ सकती थीं। एक औरत अपनी सराय में ठहरने के लिए लोगों को बुला रही थी। गू छिंग ने जाकर खाट और चूल्हा देखा, फिर दादी से कहा कि वे ख़ुद आकर देखें। दरवाज़े की नीची सीढ़ी पार करना नाव पर चढ़ने से आसान था। दादी ने वहीं ठहरना चुना।

लूदू में रात को मेंढकों की आवाज़ आती थी। सराय का बिस्तर भी मुलायम नहीं था, मगर रज़ाई धूप में सुखाई गई थी और उसमें धूप की एक खुरदरी-सी महक थी। गू छिंग ने दादी के घुटने के पास की गरम पट्टी बदल दी और खुद बिस्तर के किनारे टिक गई। अचानक उसे इतनी नींद आई कि उसकी बोली भी धीमी पड़ गई। शन सू ने उसे ऊपर आकर आराम करने को कहा, पट्टी के पूरी तरह ठंडी होने का इंतज़ार करने की ज़रूरत नहीं थी। दोनों एक के बाद एक लेट गईं। खिड़की के बाहर अजनबियों के कदमों की आवाज़ थी। कोई उन्हें नहीं जानता था। कोई फूल गू छिंग का इंतज़ार नहीं कर रहा था कि वह दीया बुझाने से पहले उसकी बँधाई पूरी करे।

अगली सुबह गु छिंग देर से जागी और चौंककर उठ बैठी। लगा नाव छूट गई। दादी कंघी कर रही थीं। बोलीं, सरायवाले ने पूछ लिया है, अगली नाव दोपहर बाद ही आएगी। खाकर पुल के पास बाँस की टोकरियाँ भी देखने जा सकती हैं। गु छिंग बाहर निकली तो धूप गरम हो चुकी थी। उसके देर से जागने के कारण घाट सिमटकर बंद नहीं हो गया था। उसने एक ठेले पर बाँस की छोटी नली चुनी। सोचा, फूलों के नमूने रखने को ख़रीद ले। हाथ फेरकर फिर रख दी और दो गरम टिकियाँ चुनने चली गई। उस दिन उसने सुबह का खाना खड़े-खड़े नहीं खाया।

दादी को बाँस की टोकरी का नमूना पसंद आ गया। गू छिंग को खींचकर बताने लगीं कि कौन-सा हिस्सा फूल की डंडी पर धागा लपेटने जैसा है। दुकानदार ने सुनकर हँसते हुए कहा कि उसने मछली की आँखें बुनी हैं, कोई फूल नहीं। शन सू नाराज़ नहीं हुईं। सिर झुकाकर बाँस की पट्टियों पर एक बार हाथ फेरा, फिर टोकरी नहीं खरीदी। गू छिंग ने टोपी के छज्जे के नीचे दबे उनके सफ़ेद बालों को देखा। अचानक मन हुआ कि पूरे दृश्य को याद रख ले, और यह भी जानती थी कि लौटकर शायद एक-एक पट्टी किस ओर जाती थी, ठीक से न बता पाए।

पंद्रह तारीख़ की दोपहर फिर नाव पर चढ़ते समय शेन सू को उस तख़्ते से अब भी डर लग रहा था। होंठ भींचे थे, लेकिन पाँव पहले जितनी देर नहीं रुके। गू छिंग किनारे पर तब तक रुकी रही जब तक वह पास वाले सिरे तक नहीं आ गईं, फिर उन्हें थामा। नाविक ने दूसरी ओर से सहारा दिया; उन्हें अकेले हिम्मत के बल पर पार नहीं करना पड़ा। बैठ जाने पर बूढ़ी स्त्री ने पहले अपना घुटना छुआ, फिर पास का ठोस खंभा टटोला और कहा कि इस नाव की लकड़ी का रंग पिछली नाव से हलका है।

नई नाव में हंस नहीं था और गु छिंग को सचमुच लगा जैसे कोई परिचित कम हो। शाम नाव लियूवान से गुज़री। किनारे बच्चे पतली छड़ियों पर लाल कपड़े की पट्टी बाँधे हवा के पीछे दौड़ रहे थे, मगर कपड़ा हमेशा दूसरी ओर उड़ता। गु छिंग देखते-देखते खो गई। शेन सु ने पुकारा तभी पता चला कि कोई थोड़ा नमक उधार माँग रहा है। उसने वह छोटी पुड़िया निकाली जो पहले दिन नहीं मिली थी और साथ के कोठे की स्त्री को चुटकी भर दिया। इस बार आखिर सूखे कपड़ों की दो तहें उलटनी नहीं पड़ीं।

सोलह की रात नाव धीरे चली। नाव चलाने वाले ने यात्रियों से कहा कि कोई किनारे पर न बैठे, उथला हिस्सा पार होने के बाद बाहर आएँ। गु छिंग केबिन में लौटकर बैठ गई। नाव के तले पानी की आवाज़ पहले महीन हुई, फिर धीरे-धीरे भरने लगी। दादी एक छोटी झपकी के बाद जागीं और पूछा कि क्या पहुँचने वाले हैं। उसने कहा, कल। पानी का रास्ता ठीक रहा तो कल। शन सू ने आँखें मूँद लीं और बहुत धीमे कहा कि उन्हें घर की कुछ याद आने लगी है। फिर यह भी कहा कि कमल देखना अभी बाकी है।

गू छिंग बिस्तर के पायताने बैठी रही। उसने दादी को थोड़ी और हिम्मत रखने को नहीं कहा, न यह कहा कि इतनी मुश्किल से यहाँ पहुँची हैं तो घर को याद करने की मनाही है। उसने गुनगुना पानी थमाया और उनके पी लेने पर कटोरा लकड़ी के धँसे हुए खाने में रख दिया। पीछे केबिन की खिड़की से रात का एक छोटा चौकोर टुकड़ा दिखता था। किनारे के दीए कभी दिखते, कभी ओझल हो जाते। नाव वापस नहीं जा रही थी, मगर उनका जो हिस्सा घर को याद कर रहा था, वह भी उनके साथ एक रात और दक्षिण की ओर जा सकता था।

· अध्याय समाप्त ·

यह पुस्तक AI की सहायता से मौलिक रूप में लिखी गई है और वांग आनशी की 《梅花》(प्लम के फूल) तथा इस वेबसाइट की मूल लघुकथा 《不卖春风》(वसंत की हवा बिक्री के लिए नहीं) का विस्तार है। पात्र, व्यापार, भूगोल और कालगणना सभी काल्पनिक हैं; यह कवि की जीवनी नहीं है। मूल रचना में पेड़ बचाने, रेशमी फूलों में सुगंध न होने और दादा-दादी तथा पोते-पोती की दो पीढ़ियों के कमल देखने के केंद्रीय चुनाव बनाए रखे गए हैं।

इस पुस्तक की विषयसूची · 36 अध्याय
  1. ठंडी महक रेशम में नहीं
  2. सफ़ेद चूने से घिरी जगह
  3. चाँद के नीचे कैंची
  4. मेज़ पर रेशमी मेई
  5. दरवाज़े का मुँह दूसरी ओर
  6. सिक्कों की दो छोटी लड़ियाँ
  7. जगह देने वाला मोड़
  8. बिना महक का दुकान का नामपट्ट
  9. आधे दिन की मज़दूरी
  10. वह फूल जो फूल नहीं है
  11. बर्फ़ के बाद पेटी बाँधना
  12. एक टहनी कितने की
  13. किसी और के घर नए साल की रात
  14. फूलों का मौसम बीतने के बाद
  15. कागज़ पर नाम छापना
  16. ठंडे भात का एक कटोरा
  17. पहली बार दोबारा बनाने की इजाज़त नहीं
  18. लौटाया हुआ डिब्बा
  19. दो लोगों का आँगन
  20. बारिश का पानी पुरानी नाली से गुज़रता है
  21. श्याओमान का हिसाब
  22. छतरी के किनारे की खाली जगह
  23. ग्राहकों को जैसा वसंत चाहिए
  24. मेज़ पर छूटे फूल
  25. एक व्यक्ति की राह
  26. पाँचवाँ महीना कारोबार के हवाले नहीं
  27. फूल देखने वाले
  28. पैसों की तीसरी थैली
  29. गर्मियों में पेड़ का क्या होगा
  30. नाव पर चढ़ने से पहले
  31. जलमार्ग का पहला पड़ाव
  32. कमल के पत्ते अभी खुले नहीं हैं
  33. पानी के बीच का वह फूल
  34. लौटते समय फूलों के मौसम की जल्दी नहीं
  35. मेई के पेड़ की गर्मियों की छाँह
  36. फिर एक नई फूल-डाली बनाएँ

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