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हाथ में एक ग्रंथ

प्राचीन परिवेश में शिल्प और जनजीवन का उपन्यास

श्याओमान का हिसाब

कू वूजी · AI सृजन · 8858 अक्षर · लगभग 12 मिनट

तीसरे महीने के पहले दिन गू छिंग टोपी की दुकान के सामने से गुज़री, भीतर नहीं गई। दुकान सँकरी थी। दरवाज़े पर घास और कपड़े की टोपियाँ लटक रही थीं। सबसे ऊपर धूसर नमदे की एक पुरानी टोपी के किनारे पर तीन नीले फूल खोंसे थे। तीसरा नीचे लटक रहा था, जैसे ठीक से बँधा न हो। गू छिंग ने रुककर एक नज़र देखी और मन में कहा कि यह फूल तो ज़रूर गिरेगा। मुड़ी तो ज़्यादा दूर नहीं जा पाई और बाँस की कंघियों के एक ठेले के उस पार फिर ठिठक गई।

टोपी ख़रीदने आई दोनों औरतें रंगशाला में काम करती थीं। दोनों की आस्तीन पर नीले रंग का एक छोटा-सा धब्बा था। लंबी वाली ने धूसर टोपी सिर पर रखी तो उसका छज्जा भौंहों तक आ गया। छोटी वाली ने उसे ज़रा पीछे खींचा और हँसकर कहा कि वह किसी उम्रदराज़ काफ़िला-रक्षक जैसी लग रही है। दुकान से एक बुज़ुर्ग आगे आने ही वाले थे कि श्याओमान पहले निकल आई। उसने तीसरा फूल उठाया और उसके नीचे छिपा बारीक फंदा दिखाया। फूल ढीला नहीं था। नीची वाली डाली को डोरी से ऊपर किया जा सकता था और कनपटी से सटाकर भी रखा जा सकता था।

लंबी स्त्री आधा चक्कर घूमी और उसकी पीठ सीधी हो गई। काम से निकलते वक़्त वह बाल हमेशा कसकर बाँधती थी। मगर टोपी आज़माते हुए उसने किनारे से दो छोटी लटें निकालीं और उँगली पर लपेटीं। कू छिंग ने उस छोटी-सी हरकत को देखकर जाना कि टोपी सिर्फ़ दावत में जाने वालों के पहनने की चीज़ नहीं है। स्त्री को तीन फूल कुछ ज़्यादा भरे लगे। श्याओ मान ने एक निकालकर दिखाया और कहा कि निकला हुआ फूल अलग लपेट देंगे। टोपी धोने के वक़्त पूरा गुच्छा भी उतारा जा सकता है।

दुकान के अंदर मोलभाव सुनाई दिया। आख़िर सबसे महँगी टोपी नहीं बिकी। औरत ने नीले-हरे कपड़े की सस्ती टोपी चुनी, साथ में दो नीले फूल और एक छोटी कुंडी अलग से ली। फिर मुड़कर अपनी साथी से कहा कि पीछे से सिर देखकर बताए। जब दोनों बाँस की कंघियों वाले ठेले से गुज़रीं तो गु छिंग ने छोटे क़द वाली को कहते सुना कि अगली बार वह नई फली के पत्ते जैसा हरा फूल लेगी। गु छिंग को अब भी लगा कि सिर पर हरा रंग कुछ ज़्यादा ठंडा दिखेगा, मगर अब उसे कोई ऐसी दलील नहीं मिली जिससे वह उस रंग को ठंडा दिखने से रोक सके।

श्याओमान उसे पहले ही देख चुकी थी और अंदर से हाथ हिला रही थी। गु छिंग को भीतर जाना पड़ा। उसने सोचा था कि पहले कहेगी, इधर फूल अच्छे बन रहे हैं। मगर मेज़ पर यहाँ-वहाँ बिखरी असमान पंखुड़ियाँ देखकर पूछा कि वे फूल हवा कैसे सह लेते हैं। श्याओमान ने बारीक कुंडी के नीचे छिपा धागे का फंदा दिखाया। अपने उपाय की बड़ाई नहीं की, बस एक टोपी उठाकर हिलाई। फूल साथ में हिले, डंडियाँ ढीली नहीं हुईं।

“काफ़ी मज़बूत है।” गू छिंग ने कहा, फिर जोड़ा, “मुझे अब भी इसका इस तरफ़ लटकना ज़्यादा पसंद नहीं।”

श्याओमान हँसी, “मुझे तो यही पसंद है कि यह तरफ़ लटकी रहे।”

दुकानदार का कुलनाम फ़ेई था। उसने पैर से एक छोटी चौकी गु छिंग की ओर सरका दी कि वह बैठ जाए। खुद वह टोपी की पट्टी से ग्राहक का सिर नापने में व्यस्त था। उसने श्याओमान को शागिर्द नहीं रखा था। वह उसे टोपी की फूलदार किनारी बनाने की मज़दूरी प्रति नग देता था। नमूना श्याओमान का था। ग्राहक को बदलाव चाहिए तो उससे फिर पूछा जाता। गु छिंग ने सुना कि वह उसे बस दोंग बिटिया कहता है, न नन्ही उस्ताद, न मोटा काम करने वाली मज़दूर। वह कुछ देर चौकी पर बैठी रही। न जाने क्यों उसे वह संबोधन अपनी कागज़ की नाम-पर्ची से भी ज़्यादा आँखों में चुभा।

घर जाकर उसने वैसा ही एक फूल बनाया जैसा देखा था। हाथों को अब भी दोनों ओर एक-सी गहराई रखने की आदत थी। फूल पलटकर देखा तो नीचा हिस्सा जैसे बीमार लग रहा था। नीचे लगा तो उठा दिया, ख़ाली लगा तो पंखुड़ियाँ जोड़ दीं। सुधारते-सुधारते आख़िर वह नीले रंग की एक भारी गेंद बन गया। खिड़की से दादी ने देखा और कहा कि रंगी हुई भाप की पूरी जैसा है। गु छिंग मुँह से बोली, तुम्हें क्या पता। मगर उसे उठाकर ज़रा हिलाया तो ख़ुद भी हँस दी। उसी हँसी के बाद वह बढ़ाई हुई पंखुड़ियाँ खोलने को राज़ी हुई।

उसने दो दिन और कोशिश की, फिर भी जिस तरफ़ जगह खाली छोड़नी थी वह ठीक नहीं बनी। धागा लपेटना उसे आता था, मगर उसे हमेशा लगता कि कम काम करके वह किसी का नुक़सान कर रही है। जहाँ जगह दिखती, भरने लगती। उसने अपने बनाए तीन बिगड़े नीले बाओज़ी निचले रैक पर साथ रख दिए। शन सू ने उनका नाम ता छिंग, अर छिंग और सान छिंग रखा, पर उसे खाना खाने बुलाया तो ‘लाओ छिंग’ कहकर पुकारा। गू छिंग झुँझलाकर उन्हें उठाने गई। दादी ने बचा लिए और बोलीं, यह हँसी उन्होंने पैसे देकर ख़रीदी है, इन्हें ले जाने की मनाही है।

चार तारीख़ को वह फिर टोपी की किनारी वाली दुकान गई। साथ में पचास वन ले गई। दस वन इसलिए कि श्याओमान एक दोपहर उसे फंदा बदलना और पंखुड़ी बाहर की ओर मोड़ना सिखाए। इसके लिए बाक़ायदा शिष्या बनने की रस्म की ज़रूरत नहीं थी। चालीस वन में, अगर श्याओमान राज़ी हो, तो वसंत के फूलों की प्रदर्शनी में इस्तेमाल किया जा सकने वाला मुड़ी पंखुड़ियों का एक नमूना खरीदेगी। याओ की दुकान की बची चालीस टहनियों में से बीस पर वह नमूना लगेगा। आगे किसी और ग्राहक के लिए इस्तेमाल करना हुआ तो अलग से बात होगी। टोपी का एक फूल खरीदकर वह उसके नमूने पर उम्र भर का हक़ नहीं लेने वाली थी। इस रकम का हिसाब उसने देर तक लगाया था। अब भी डर था कि श्याओमान को कम लगेगी, मगर इस बार उसने पैसे देते समय पहले से उसे एहसान का नाम नहीं दिया।

श्याओमान ने वे चालीस वन नहीं लिए। पहले पूछा कि कितने फूल बनाने हैं और कौन खरीदेगा। गू छिंग ने कागज़ पर लिखे बीस के चारों ओर घेरा बनाया। फिर कहा कि याओ की दुकान को दो रंग चाहिए, सब धूसर टोपी वाले नीले जैसे नहीं। श्याओमान ने कोयले की कलम खींच ली और एक बड़ी, एक छोटी गोलाई खींची, “ऐसे बदलो तो फूल का बीच थोड़ा खुला रहेगा, बगल से भी दिखेगा। नाम कैसे लिखोगी?”

“नमूना दोंग श्याओमान का, बनाया गू छिंग ने।”

श्याओमान कुछ देर उसे देखती रही, जैसे परख रही हो कि यह बात आज के दिन सुनने में अच्छी लगे, बस इसलिए कही गई है या नहीं। गु छिंग ने सफ़ाई नहीं दी कि वह पहले भी उसका नाम लिखना चाहती थी। बस कहा कि पहले इसलिए नहीं लिखा कि उसे डर था, दुकानदार समझेगा कि वह किसी और के बिना काम पूरा नहीं कर सकती। दुकान के भीतर मालिक फ़ेई एक ग्राहक से सिर के घेरे पर बहस कर रहे थे। आवाज़ इतनी ऊँची थी कि उसकी आधी बात लगभग दब गई। श्याओमान ने फिर भी सुन लिया। उसने कलम उठाई और “बीस” के पास “इस खेप के” जोड़ दिया। बोली, अगली बार किसी लिखना जानने वाले से साफ़ उतारवा लेना, मेरी तरह टेढ़ा मत लिखना।

फूल बनाना सीखने की उस दोपहर गू छिंग ने पहली बार हाथ की पीठ पर किसी की छड़ी खाई। श्याओ मान ने बाँस की पतली तीली से हल्के से छुआ और कहा कि अँगूठा ढीला करो, तभी पंखुड़ी उछलकर वापस नहीं जाएगी। गू छिंग हमेशा एक हाथ से आकार जमाकर दूसरे से बाँधना चाहती थी। श्याओ मान ने कहा कि पहले टोपी के किनारे का घुमाव सहारे के लिए इस्तेमाल करो, हाथ से सब कुछ पकड़ना ज़रूरी नहीं। उसने पकड़ ज़रा ढीली की तो हल्के नीले रंग का एक कोना सचमुच किनारे के साथ बाहर की ओर खुल गया, जैसे किसी ने तने हुए कंधे नीचे छोड़ दिए हों।

फूल बन गया तो उससे रहा नहीं गया। हथेली पर रखकर उसे उलट-पलटकर देखने लगी। श्याओमान उसके बगल में खड़ी हुई और बताया कि फूल अब भी कुछ ज़्यादा गोल था, टोपी पर लगेगा तो आसमान की ओर मुँह करेगा। गू छिंग ने दाँत भींचकर धागे के दो फेर उधेड़े और उसे फिर ठीक किया। उसे याद आया कि पहले जब कोई काम दोबारा करता था तो वह कितनी अधीर हो जाती थी, और आज उसे कितनी चाह थी कि कोई उसे ठीक यही जगह बता दे। श्याओमान ने इसके ज़्यादा पैसे नहीं लिए, मगर साँझ होते ही मेज़ समेट दी। उसने कहा कि कल दूसरा काम है, और देर तक नहीं रुक सकती।

गू छिंग नया नमूना लेकर घर चली। रास्ते में हरे प्याज़ वाली दो रोटियाँ ख़रीदीं। एक दादी के लिए रखी, दूसरी चलते-चलते ख़ुद खाई। आस्तीन पर तेल लग गया और अचानक उसे लगा कि घर पहुँचकर उसे फ़ौरन धो डालने की कोई जल्दी नहीं है। बना हुआ फूल पूरा का पूरा उसका नहीं था, मगर हाथों में जो ख़ुशी थी वह बहुत सच्ची थी, फूल की पर्ची पर अपना नाम लिखने की ख़ुशी से भी ज़्यादा सीधी।

छह तारीख को दोनों बाकी ऑर्डर देखने याओ की दुकान गईं। गु छिंग ने पहले साफ़ किया कि बीस डालियाँ श्याओमान के नमूने के हिसाब से बनेंगी और नमूने का पैसा वह खुद देगी, याओ ल्याओ से अलग से नहीं माँगेगी। याओ ल्याओ ने नमूना देखकर कहा कि इस्तेमाल के लायक हो तो यह साफ़ लिखने में हर्ज़ नहीं कि नमूना किसका है। दुकान में बिक्री पहले की तरह ल्याओहुआ जी के नाम से होगी। काग़ज़ की पर्ची अंदर की पैकिंग में जाएगी ताकि ग्राहकों की फूल चुनने की जगह न घिरे। श्याओमान मान गई, मगर पहले पक्की पर्ची देखना चाहती थी। गु छिंग बगल में सुनती रही। उसने आगे बढ़कर उसकी ओर से हामी नहीं भरी।

याओ ल्याओ ने ऊँचे-नीचे फूल देखकर पूछा कि बगल की ओर करके पेटी में रखने से वे दबेंगे तो नहीं। गु छिंग ने अपनी बदली हुई विभाजक तहें निकालीं और पहली बार यह कहने की जल्दी नहीं की कि कोई समस्या हो ही नहीं सकती। उन्होंने छह फूल रखकर देखा और अगले दिन खोला; नीचे वाला हिस्सा दब गया था। तीनों ने एक-एक डाली उठाई और उसी जगह को देखा। श्याओ मान ने नीचे की पंखुड़ी ज़रा भीतर की, गु छिंग ने खाँचे का किनारा काटकर चौड़ा किया, और हान महोदया ने उनके लिए एक गाँठ निकाल दी। नाम लिख देने से समस्या अपने आप हल नहीं हुई थी; बीसों डालियों में अब भी उतना ही श्रम लगना था।

गु छिंग ने श्याओमान से अलग से कहा कि इस खेप के लिए वह बस मोटी डंडियों के बीस हिस्से बनाए। पहले की तरह हर हिस्से के दो वन तय हुए और काम तीन बार में देना था। अगर गु छिंग नमूना बदलती और काम खोलना पड़ता, तो उसकी मज़दूरी अलग गिनी जाती। टोपियों की किनारी का काम पहले की तरह चलता रहा। श्याओमान ने पहले ही बता दिया कि वह किन दो दिनों में नहीं आ सकेगी। जब उसने अपना समय बताया, गु छिंग ने कोयले से अपने काग़ज़ पर निशान लगा लिए। उसने हर ख़ाली खाने को श्याओमान के आने का दिन नहीं मान लिया।

मोटे डंठलों की उस खेप की दूसरी सुपुर्दगी पर श्याओमान पंद्रह मिनट देर से आई। गू छिंग ने सिर उठाया और मुँह खोल चुकी थी कि याद आया, श्याओमान ने पहले बताया था कि रंगाईघर में नए रंग का एक पीपा है जिसे बेकार नहीं जाने देना है। श्याओमान ने एक ख़राब डंठल अलग रखकर कहा कि कसते वक़्त उसने एक फेर ज़्यादा दे दिया था। वह उसे वापस ले जाकर फिर लपेटेगी, अभी दिया हुआ न गिनें। गू छिंग ने उठाकर देखा। मज़बूती में कमी नहीं थी, बस लपेटे धागे के रोएँ निकल आए थे। अगर उसे वापस न करती तो आगे अच्छे-बुरे का कोई पैमाना फिर नहीं रहता। उसने वह डंठल लौटा दिया, बगल के अच्छे डंठल गिनकर ले लिए और इस बहाने कोई पुरानी ग़लती नहीं उठाई।

उस दोपहर उसने अकेले पाँच तैयार फूल जाँचे। सबसे पतली जगह पर पुराना कपड़ा हल्के से रगड़ा और फिर दूसरी तरफ़ से देखा कि रंग छूटता है या नहीं। दादी ने पूछा कि उस काग़ज़ी पर्ची पर लिखना सार्थक रहा या नहीं। उसने जाँच का कपड़ा उठाकर कहा कि सार्थक हो या न हो, पहले इसे तो ठीक करना ही है। पाँच बार रगड़ने के बाद भी सफ़ेद कपड़ा सफ़ेद था। उसने उसे धोकर सूखने डाल दिया। बाहर से दो लड़कियाँ अलग-अलग फूल ख़रीदने आईं। उन्होंने पहले उसकी बनाई सपाट पंखुड़ियों वाले फूल देखे, फिर श्याओमान की मुड़ी पंखुड़ियों वाले। दोनों ने एक-एक फूल चुना। किसी ने भी दूसरे फूल को बुरा नहीं कहा।

दुकान से निकलते समय श्याओ मान ने अचानक पूछा:“वे तीन नीले बन अभी भी हैं?”

गू छिंग ने हैरानी से पूछा कि उसे कैसे पता। श्याओमान ने कहा कि दादी कल रंगाईघर में कपड़ा देने आई थी और ऐसी सुनाई कि लगभग पूरी गली जान गई। गू छिंग का चेहरा लाल हो गया। उसने धीमे से दादी को बात फैलाने के लिए कोसा। श्याओमान इतनी हँसी कि चौखट पकड़नी पड़ी। आख़िर गू छिंग ने उन तीनों फूलों को नष्ट भी नहीं किया। एक ढाँचे के कोने पर रख छोड़ा, ताकि नई कलफ़ आज़माते वक़्त उसी को मोड़े और आगे अपना साहस दिखाने के लिए बिक्री का तैयार माल ख़तरे में न डाले।

आठवें दिन भीतर लगाने वाली पहली पर्ची लिखी गई। गू छिंग अब भी धीरे-धीरे पढ़ती थी। उसने दिंग फ़ंगछ्वान से वह वाक्य उतार देने को कहा जो दोनों ने मिलकर तय किया था। अक्षर बड़े होने की ज़रूरत नहीं थी, बस साफ़ पढ़े जाएँ। बुज़ुर्ग दिंग ने दोनों को पढ़कर सुनाया। दोनों से अलग-अलग हामी मिलने पर ही उसने पर्ची काटकर आज़माइशी डिब्बे में खोंसी। गू छिंग को काग़ज़ का किनारा थोड़ा रोएँदार लगा। उसे उस पुरानी मुहर का ख़याल आया जिस पर सिर्फ़ उसका अपना नाम खुदना था। उस समय सच में खुदवा ली होती तो आज भी एक और पंक्ति जोड़नी पड़ती।

घर लौटी तो दादी एक हल्की भूरी टोपी में अस्तर लगा रही थीं। वह चन चाची की छोड़ी हुई पुरानी टोपी थी। दादी ने फटा हिस्सा सिल लिया था और चाहती थीं कि वसंत की धूप में बाहर निकलें तो उसे पहन लें। गू छिंग ने नया फूल निकालकर टोपी के बग़ल में लगाया। शन सू ने देर तक देखा, फिर नीची पंखुड़ी की ओर इशारा करके कहा कि यह हिस्सा ऐसा है मानो किसी की ठोकर से टेढ़ा हो गया हो। गू छिंग हँस पड़ी। उसने फूल को थोड़ा बग़ल की ओर घुमाया, पंखुड़ी ऊपर नहीं उठाई। “आपको पसंद न हो तो बराबर वाला भी बना सकती हूँ।” उसने कहा। दादी ने थोड़ी देर और आईने में देखा, फिर ख़ास तौर पर वही टेढ़ा फूल चुना और उसे पहनकर पानी में अपना अक्स देखने कुएँ की ओर चली गईं।

· अध्याय समाप्त ·

यह पुस्तक AI की सहायता से मौलिक रूप में लिखी गई है और वांग आनशी की 《梅花》(प्लम के फूल) तथा इस वेबसाइट की मूल लघुकथा 《不卖春风》(वसंत की हवा बिक्री के लिए नहीं) का विस्तार है। पात्र, व्यापार, भूगोल और कालगणना सभी काल्पनिक हैं; यह कवि की जीवनी नहीं है। मूल रचना में पेड़ बचाने, रेशमी फूलों में सुगंध न होने और दादा-दादी तथा पोते-पोती की दो पीढ़ियों के कमल देखने के केंद्रीय चुनाव बनाए रखे गए हैं।

इस पुस्तक की विषयसूची · 36 अध्याय
  1. ठंडी महक रेशम में नहीं
  2. सफ़ेद चूने से घिरी जगह
  3. चाँद के नीचे कैंची
  4. मेज़ पर रेशमी मेई
  5. दरवाज़े का मुँह दूसरी ओर
  6. सिक्कों की दो छोटी लड़ियाँ
  7. जगह देने वाला मोड़
  8. बिना महक का दुकान का नामपट्ट
  9. आधे दिन की मज़दूरी
  10. वह फूल जो फूल नहीं है
  11. बर्फ़ के बाद पेटी बाँधना
  12. एक टहनी कितने की
  13. किसी और के घर नए साल की रात
  14. फूलों का मौसम बीतने के बाद
  15. कागज़ पर नाम छापना
  16. ठंडे भात का एक कटोरा
  17. पहली बार दोबारा बनाने की इजाज़त नहीं
  18. लौटाया हुआ डिब्बा
  19. दो लोगों का आँगन
  20. बारिश का पानी पुरानी नाली से गुज़रता है
  21. श्याओमान का हिसाब
  22. छतरी के किनारे की खाली जगह
  23. ग्राहकों को जैसा वसंत चाहिए
  24. मेज़ पर छूटे फूल
  25. एक व्यक्ति की राह
  26. पाँचवाँ महीना कारोबार के हवाले नहीं
  27. फूल देखने वाले
  28. पैसों की तीसरी थैली
  29. गर्मियों में पेड़ का क्या होगा
  30. नाव पर चढ़ने से पहले
  31. जलमार्ग का पहला पड़ाव
  32. कमल के पत्ते अभी खुले नहीं हैं
  33. पानी के बीच का वह फूल
  34. लौटते समय फूलों के मौसम की जल्दी नहीं
  35. मेई के पेड़ की गर्मियों की छाँह
  36. फिर एक नई फूल-डाली बनाएँ

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