मुख्य सामग्री पर जाएँ

CooLWJ पर खोजें

选择搜索范围,输入关键词后按回车。

भाषा

हाथ में एक ग्रंथ

प्राचीन परिवेश में शिल्प और जनजीवन का उपन्यास

पहली बार दोबारा बनाने की इजाज़त नहीं

कू वूजी · AI सृजन · 8914 अक्षर · लगभग 12 मिनट

तीसरे दिन युनजिन में कोहरा छाया। गू छिंग ने बरामदे से हाथ बाहर निकाला तो हथेली पर जल्दी ही नमी की एक परत जम गई। फिर भी हाथ वापस खींचते हुए उसने ख़ुद से कहा कि लगातार पाँच दिन गीले नहीं रहेंगे। पच्चीस से तैयार किए डंठल, पहले जमा किए फूलों के बीच और श्याओमान के तय मुताबिक़ किए मोटे काम की बदौलत अस्सी में से चालीस से ज़्यादा फूल आकार ले चुके थे। बाक़ी चार उथली तश्तरियों में बिखरे थे, जैसे किसी पोशाक के चार अनसिले टुकड़े।

गू छिंग ने कोयले से काग़ज़ पर दिनों का हिसाब बनाया था। आख़िरी दो दिन सुखाने, छाँटने और बक्सों में रखने के लिए छोड़े थे। दादी के घर से बाहर रहने की दो रातें, आँख धोने और खाना बनाने में लगा समय और रंग की कई आज़माइशें मिलकर उनमें से एक दिन खा गईं। वह फूलों के रंग और कम करने को राज़ी नहीं थी। किसी बड़ी दुकान को अपने नाम से पहली बार माल देते हुए अगर वह सिर्फ़ सबसे आसान नमूने ले गई, तो आगे लोग समझेंगे कि उसे बस आसान काम आता है। इसलिए उसने गरम लाल रंग की पंखुड़ियों की दो तश्तरियों की जगह नए हल्के सुनहरे रंग की पंखुड़ियाँ रखीं, जिनकी तह के किनारे पर एक और गहरी मोड़ दबाकर बनानी थी।

श्याओ मान ने कागज़ का नमूना देखकर कहा कि मूल पंखुड़ी बाहर की ओर पलटती है। तह और गहरी होगी तो नोक कड़ी हो जाएगी। “कलफ़ की यह परत अब और मोटी नहीं हो सकती।” उसने नाखून से सूखी छोटी पंखुड़ी को हल्का-सा ठोंका। पतली-सी आवाज़ से उसका भुरभुरापन सुनाई दे रहा था। गू छिंग जानती थी कि बात सही है, मगर लहजा ऐसा लगा जैसे वह उसके काम की जाँच कर रही हो। उसने कलफ़ की चम्मच कटोरे की धार पर पटकी, “बड़ा फूल बनाओ तो उसे अपना आकार सँभालना चाहिए। संदूक में रखकर कुछ दूर ले जाओ तो मुलायम वाले सब पिचक जाते हैं। अभी मेरे तरीके से करो।”

यह पहली बार नहीं था कि उसने नमी से मिलने वाली सीख सुनी हो। नीले आलूबुख़ारे के फूलों वाला आज़माइशी संदूक ऊँची अलमारी पर ही था। उसके एक कोने पर रंग का दाग़ अब भी था जो धोने से नहीं गया। उसने संदूक उतारकर श्याओ मान को दिखाया और कहा कि वह हवा लगने देना सीख चुकी है। इस बार हर तह में जगह छोड़ेगी और बाहरी संदूक भी पूरी तरह बंद नहीं करेगी। श्याओ मान ने डिब्बे के कोने पर उँगली रखी। कहना चाहती थी कि अंदर नमी होना और बाहर से हवा बंद होना दो अलग बातें हैं, मगर उसे नमूना लेने की राह देखते पाया तो आख़िर डिब्बा वापस रख दिया।

श्याओमान ने एक हल्का सुनहरा फूल अलग रखा था जिस पर कलफ़ की दूसरी तह नहीं लगाई थी। उसका एक सिरा ऊँचा था और दूसरा नीचा। ऊँची तरफ़ पंखुड़ी बाहर को मुड़ी थी और नीची तरफ़ फूल का ज़रा-सा बीच दिखता था। टोपी के पास रखने पर लगता था जैसे अभी उस पर से हवा गुज़री हो। गू छिंग ने उसे अस्सी डालियों के बीच लगाया और पहली नज़र में ही देख लिया कि दोनों तरफ़ ऊँचाई बराबर नहीं है। उसने उसे निकालकर ऊँची पंखुड़ी भीतर की ओर मोड़ दी। श्याओमान ने अचानक हाथ बढ़ाकर डंठल दबा लिया।

“यह टहनी मैं रखूँगी।”

“काट तो चुकी हो, फिर भी साथ ले जाओगी?”

“कपड़े का पैसा मेरी इस आधे दिन की मज़दूरी से काट लेना। तुम्हें सब एक जैसा चाहिए तो ठीक इसी तरह का एक और टुकड़ा कटा रखा है।”

गू छिंग ने हाथ ढीला छोड़ दिया। वह कह सकती थी कि एक नमूने के पैसे काटने की ज़रूरत नहीं, मगर मुँह से निकला, “तो तुम ठीक से हिसाब रख लेना।” श्याओ मान ने छोटा फूल बाँह की जेब में खोंसा, बालों में नहीं लगाया। दोपहर में भी उसने मोटी डंडियों के पूरे तीन हिस्से बनाए और समय होते ही उठ गई। गू छिंग ने पूछा कि क्या वह एक पहर का चौथाई और रुक सकती है। उसने कहा कि टोपी की किनारी की दुकान में आज नया नमूना आज़माना है, नाप देने जाना होगा। गू छिंग मेज़ के सामने बैठी रही। अचानक उसे उस दुकान से नफ़रत होने लगी जिसके भीतर उसने अभी तक कदम भी नहीं रखा था।

उसने श्याओमान के जाने के बाद बाहर की ओर मुड़ी बाकी सारी पंखुड़ियों को बराबर कर दिया। करते हुए मन में एक तसल्ली थी। आख़िर कुछ समझाना नहीं पड़ रहा था। आख़िर हर टहनी ऐसी लग रही थी जैसे एक ही जोड़ी हाथों से निकली हो। बारहवीं टहनी पर पहुँची तो पंखुड़ियों का घेरा इतना सख़्त था कि पलटा नहीं जा रहा था। उसने थोड़ी भाप दिखाई और फिर मोड़ा। ठंडा होने पर वह टिक तो गया, मगर तह की लकीर सफ़ेद पड़ गई। उसने वह टहनी सबसे अँधेरी जगह रख दी। सोचा, संदूक भरते समय छाँटेगी।

शन सू कुछ देर दरवाज़े के पास खड़ी देखती रहीं। पुराने ज़माने में क्या करना चाहिए होता, इस पर कुछ नहीं बोलीं। उन्होंने पूछा कि रात में क्या खाएँगी। गु छिंग ने कहा, कुछ भी। दादी ने फलियों वाला भात चढ़ा दिया और उसमें मूली के टुकड़े डाल दिए। भात पकने पर बुलाया तो गु छिंग ने कहा कि दो डालियाँ और बाकी हैं। दूसरी बार बुलाने पर बस हुँकारी भरी। शन सू ने पहले अपना कटोरा भरा। खाकर दूसरे कटोरे को हाँडी में ढक दिया और उसके इंतज़ार में अपना खाना ठंडा करने नहीं बैठीं। काम निपटाकर गु छिंग ने ढक्कन उठाया तो भात अब गरम नहीं था। खाते हुए उसे बुरा लग रहा था। आख़िर वह दोनों की आने वाली ज़िंदगी के लिए ही तो इतनी जल्दी में लगी थी।

चार तारीख़ को याओ की दुकान से एक औरत ग्राहक को दिखाने के लिए एक नमूना लेने आई। उसका कुलनाम हान था और पिछले आँगन में फूल सुखाने का काम वह देखती थी। उँगली में हमेशा घिसकर चिकनी हो चुकी ताँबे की अंगुश्तानी पहने रहती थी। गु परिवार के बरामदे में लाल और सुनहरे रंग लटकते देखकर उसने कहा कि ग्राहक मेले की बैठक में देर शाम तक रहेंगी। पूछा, क्या फूल के आधार में थोड़ा सुगंधित चूरा सिल सकते हैं। ख़ुशबू बिल्कुल असली लगे, यह ज़रूरी नहीं, बस पास लाने पर थोड़ी-सी आए।

गू छिंग ने जवाब दिया, “ख़ुशबू की पोटली अलग बना सकती हूँ। फूल में अपनी ख़ुशबू होने की बात नहीं कह सकते। सुगंधित चूर्ण रेशम पर लगा तो निशान छोड़ देगा, और चूर्ण बदलने में फूल का आधार भी टूट जाएगा।”

हान ने कहा कि वह बस पूछने आई है, ग्राहक की ओर से हामी नहीं भर रही। उसने नमूना लिया और जाते-जाते उँगलियों में एक पंखुड़ी मसलकर कहा कि सुखाने के लिए पूरे दिन मिलने चाहिए। गु छिंग ने सिर हिलाया। उसके जाने के बाद लगा जैसे यह बात श्याओमान ने उससे कहलवाई हो। उसे मालूम था कि इस ख़याल का कोई आधार नहीं था। फिर भी उसने नए फूलों की थाली अंगीठी के पास खिसका दी। सोचा, अंदर तक सूख जाएँ तो कोई कमी नहीं निकाल सकेगा।

अँगीठी पास नहीं थी, फिर भी गरमी एक ही ओर से आ रही थी। वह हर आधी कड़ी पर तश्तरी घुमाती रही। बाहर की परत जल्दी सूख गई, मगर पंखुड़ियों की तहों के बीच गीली कलफ़ अब भी चिपचिपी थी। रात को उसने एक फूल की पंखुड़ियाँ जोड़कर देखीं। भीतर से हल्की खट्टी गंध उठी तो उसे फ़ौरन खोल दिया। खोली गई पंखुड़ियों के किनारे रोएँदार हो गए थे, वे पहली खेप में नहीं लग सकती थीं। उसने बिगड़ी पंखुड़ियों की छोटी-सी ढेरी चाय के कटोरे के नीचे दबा दी, दादी को नहीं दिखाई, और बचे रेशम से फिर काटने लगी।

पाँच तारीख की सुबह झोउ जीपिंग वहाँ से गुज़रा और पिछली बार उधार दिया लकड़ी का पैमाना लेने आया। गु छिंग ने आँगन में चौकियों की तीन कतारें लगा रखी थीं और धूप के साथ-साथ थालियाँ सरकाकर देख रही थी। सर्दियों की धूप दीवार के सिर को छूती हुई निकल जाती थी। नई रखी चीज़ें दो घंटे से भी कम में छाया में आ जाती थीं। झोउ जीपिंग ने उसे धूप के पीछे भागते देखा तो सबसे भारी थाली उठाने को हाथ बढ़ाया। उसने कहा, छूना मत। उसका हाथ हवा में रुक गया। फिर उसने गिरी हुई खाली चौकी थामी और पूछा कि इसे कहाँ रख सकता है।

“तुम्हारे यहाँ ख़ाली छज्जे के नीचे जगह है क्या?” उसने पूछा।

“इन दो दिनों में तेल चढ़े छाते रखे हैं, गंध तेज़ है। बगल का रंगाईघर भी गीला है।”

जब उसने सुना कि उसके यहाँ भी जगह ख़ाली नहीं है, तो उलटे उसकी झुँझलाहट कुछ कम हो गई। वह ख़ुद पर हँसी कि उसने पूरी गली को जैसे ख़ाली सुखाने के ढाँचों से भरा समझ रखा था। उसने गू छिंग की मदद की और बाँस की दो छड़ें चौकी की पीठ पर बाँध दीं। तश्तरियाँ उन पर हल्की तिरछी रखीं तो नीचे की तह तक ज़्यादा रोशनी पहुँच सकती थी। जाते वक़्त उसने अंगीठी की ओर इशारा किया, “पास बैठे आदमी को गरमी मिलती है, फूल शायद उसे सह न सकें।” गू छिंग ने पलटकर कुछ नहीं कहा और अंगीठी वापस चूल्हे के दरवाज़े के पास रख दी।

उस दिन आधी दोपहर धूप निकली। शन सू गरम पानी की केतली आँगन में रख गईं। गू छिंग उकड़ूँ बैठी तश्तरियाँ पलट रही थी और दादी बग़ल में बैठी लहसुन छील रही थीं। दोनों की परछाइयाँ धीरे-धीरे सिकुड़कर कुएँ की जगत के पाये तक आ गईं। गू छिंग ने पहली बार साफ़ देखा कि हल्के सुनहरे फूलों की उस तश्तरी की चमक पिछले दिन जैसी नहीं थी। जहाँ सूख चुका था वहाँ चमक थी, जहाँ कलफ़ मोटा था वहाँ अकड़न। उसने सबसे ज़्यादा बदली हुई कुछ डालियाँ निकालीं। जी हुआ फिर से बनाए, मगर सामने दर्ज आठ तारीख़ पर एक नज़र पड़ी और आख़िर उसका हाथ रुक गया।

उसे फ़र्क़ साफ़ दिख रहा था। उसे डर था कि अगर इस बार पीछे हटी तो आगे कोई उसे दो सौ टहनियाँ बनाने को नहीं देगा। यह भी डर था कि याओ ल्याओ पूछेगी कि इस वक़्त तक नमूना क्यों बदल रही है और कहेगी कि पहले उसने कितनी आसानी से हामी भर दी थी। उसने वे टहनियाँ दाहिनी ओर रखीं। बाईं तरफ़ बस वे रहीं जिन्हें सचमुच और छेड़ने की ज़रूरत नहीं थी। रात में गिना तो बाईं तरफ़ सिर्फ़ चवालीस टहनियाँ थीं।

अगर वह इसी समय खबर भेज दे और मान ले कि पहली खेप में बस इतने ही फूल दे पाएगी, तो आगे बात और नहीं बिगड़ेगी। वह दीया लेकर दरवाज़े तक गई। याओ की दुकान से माल लेने वाला कल किस समय गली से गुज़रेगा, यह भी सोच चुकी थी। आँगन के बाहर चेन चाची के कपड़े सुखाने वाला ढाँचा समेटने की आवाज़ आई, फिर वेन परिवार के यहाँ माल ढोते हुए एक-एक करके गिनती पुकारने की। उधर गिनती अस्सी तक पहुँची तो उसने सिर झुकाया, दीया वापस मेज़ पर ले गई और दाईं ओर की छत्तीस टहनियाँ फिर गिनने लगी।

उस रात फूल ख़रीदने एक और स्त्री आई। वह आटा पीसने वाली थी, जिसने पहले पश्चिमी बाज़ार में उससे कैमेलिया लिया था। अब छोटी बहन के विवाह के लिए उपहार देना चाहती थी। उसे बस एक लाल फूल चाहिए था। गु छिंग ने कहा कि इस खेप में से नहीं दे सकती, फिर अलमारी के पुराने नमूने निकाले। स्त्री को सबसे पहले वाला सफ़ेद आलूबुखारे का फूल पसंद आया, लेकिन लगा कि सफ़ेद रंग उपयुक्त नहीं है। उसने फिर लौटा दिया और कुछ देर खड़ी रहने के बाद चली गई। गु छिंग उसे दरवाज़े तक छोड़ने गई। लगभग कह ही दिया कि दो दिन रुको, बनाकर पहुँचा दूँगी, मगर ज़ुबान तक आई बात निगल ली। अब वह एक लाल फूल का भी वादा नहीं कर पा रही थी।

दरवाज़े के बाहर उस स्त्री ने अभी गाड़ी पर आटे की बोरी बाँधी थी। उसकी उँगलियाँ ठंड से इतनी अकड़ गई थीं कि मुड़ नहीं रही थीं। गु छिंग ने रस्सी का सिरा फंदे में डालने में मदद की। स्त्री ने बताया कि उसकी बहन को चटख लाल पसंद नहीं, उसे ऐसा लाल चाहिए जो ज़रा पुराना लगे, जैसे दो साल पहनी हुई अस्तरदार जैकेट का रंग। गु छिंग ने सिर उठाया। अचानक याद आया कि दाहिनी ओर की खेप का रंग, जिसे उसने और गहरा कर दिया था, पहले इसी तरह का पुराना लाल था। उसने पूछा, परसों फिर आओगी क्या। स्त्री ने सिर हिलाया। शुभ दिन ठहरता नहीं, वह कहीं और ढूँढ़ लेगी। पहिया बर्फ़ की पतली परत पर चढ़ा और बर्फ़ के टुकड़े उछलकर गु छिंग के जूते की नोक पर लगे। वह गाड़ी के मुड़ने तक खड़ी रही, फिर भीतर लौटी। इस छोटी-सी बिक्री के लिए उसने फूलों की पूरी थाली फिर से नहीं खोली।

छह तारीख़ की दोपहर उसने पहले की तरह श्याओमान को तय समय पर बुलाया कि वह आख़िरी बार फूलों के आधार बाँध दे। श्याओमान एक-एक टहनी लेती गई। उसने भाँपा कि कुछ डंडियाँ पहले ही दो बार खोली जा चुकी हैं, मगर पूछा नहीं। उलटे गु छिंग ने पहले पूछ लिया कि इन दिनों उसने हल्की सुनहरी टहनी क्यों नहीं पहनी। श्याओमान ने बताया कि उसे पहनकर टोपियों की किनारी वाली दुकान गई थी। वहाँ रंग आज़माने के लिए रख ली गई है, जब चाहे वापस ला सकती है। गु छिंग का गला कस गया। बोली, फूल का सामान उसके अपने घर का था। उसने पहले उसे अपने पास रखने की इजाज़त दी थी, किसी और को बेचने के लिए देने को नहीं कहा था।

श्याओमान ने हाथ की टहनी बाँधकर पूरी की, तब बोली, “मैंने बेची नहीं। तुमने सामग्री के पैसे काट लिए थे, इस टहनी के सामान का मुझ पर कोई उधार नहीं है।”

गू छिंग के पास कहने को कुछ नहीं था। उसने छह वन गिनकर मेज़ के किनारे रखे। श्याओ मान ने उन्हें लिया और उसके सामने छोटे से काग़ज़ पर तीन छोटी लकीरें खींचीं। उस हल्की-सी आवाज़ से गू छिंग को झगड़े से ज़्यादा तकलीफ़ हुई। कहना चाहती थी कि याओ की दुकान में भले ही सिर्फ़ उसका अपना नाम लिखा गया हो, आगे और मौक़े ज़रूर आएँगे। मुँह खोला, देखा कि श्याओ मान सुई बाँह की जेब में रख चुकी है, और फिर बंद कर लिया।

सातवीं की रात अस्सी डंडियों वाले फूल चार पुराने बक्सों में बाँट दिए गए। खानों के बीच हवा जाने की जगह थी, डंडियाँ अपनी जगह बँधी थीं और बाहर की रस्सियाँ अब कसकर नहीं खींची गईं। गू छिंग ने हर वह काम ध्यान से किया जो वह ठीक कर सकती थी। ज़्यादा कलफ़ वाले छत्तीस फूल अलग-अलग बक्सों में रखे गए। उसने उन्हें एक बक्से में अलग नहीं रखा, मानो इससे एक ऐसी भूल कम हो जाती जो पहली नज़र में दिख जाती। दादी दीया लेकर रोशनी करने आईं तो उसने बक्से का कोना हाथ से ढक दिया कि कहीं तेल भीतर न टपके। दीए की रोशनी हट गई, फिर भी हल्के सुनहरे फूल अँधेरे में एक अकड़ी हुई चमक दे रहे थे। ढक्कन गिरा तो एक बेहद पतली किरच उसके हाथ की पीठ पर आ गिरी। उसने उसे सरकाकर हथेली में लिया और मुट्ठी बाँध ली।

· अध्याय समाप्त ·

यह पुस्तक AI की सहायता से मौलिक रूप में लिखी गई है और वांग आनशी की 《梅花》(प्लम के फूल) तथा इस वेबसाइट की मूल लघुकथा 《不卖春风》(वसंत की हवा बिक्री के लिए नहीं) का विस्तार है। पात्र, व्यापार, भूगोल और कालगणना सभी काल्पनिक हैं; यह कवि की जीवनी नहीं है। मूल रचना में पेड़ बचाने, रेशमी फूलों में सुगंध न होने और दादा-दादी तथा पोते-पोती की दो पीढ़ियों के कमल देखने के केंद्रीय चुनाव बनाए रखे गए हैं।

इस पुस्तक की विषयसूची · 36 अध्याय
  1. ठंडी महक रेशम में नहीं
  2. सफ़ेद चूने से घिरी जगह
  3. चाँद के नीचे कैंची
  4. मेज़ पर रेशमी मेई
  5. दरवाज़े का मुँह दूसरी ओर
  6. सिक्कों की दो छोटी लड़ियाँ
  7. जगह देने वाला मोड़
  8. बिना महक का दुकान का नामपट्ट
  9. आधे दिन की मज़दूरी
  10. वह फूल जो फूल नहीं है
  11. बर्फ़ के बाद पेटी बाँधना
  12. एक टहनी कितने की
  13. किसी और के घर नए साल की रात
  14. फूलों का मौसम बीतने के बाद
  15. कागज़ पर नाम छापना
  16. ठंडे भात का एक कटोरा
  17. पहली बार दोबारा बनाने की इजाज़त नहीं
  18. लौटाया हुआ डिब्बा
  19. दो लोगों का आँगन
  20. बारिश का पानी पुरानी नाली से गुज़रता है
  21. श्याओमान का हिसाब
  22. छतरी के किनारे की खाली जगह
  23. ग्राहकों को जैसा वसंत चाहिए
  24. मेज़ पर छूटे फूल
  25. एक व्यक्ति की राह
  26. पाँचवाँ महीना कारोबार के हवाले नहीं
  27. फूल देखने वाले
  28. पैसों की तीसरी थैली
  29. गर्मियों में पेड़ का क्या होगा
  30. नाव पर चढ़ने से पहले
  31. जलमार्ग का पहला पड़ाव
  32. कमल के पत्ते अभी खुले नहीं हैं
  33. पानी के बीच का वह फूल
  34. लौटते समय फूलों के मौसम की जल्दी नहीं
  35. मेई के पेड़ की गर्मियों की छाँह
  36. फिर एक नई फूल-डाली बनाएँ

टिप्पणी अनुभाग

टिप्पणियाँ लोड हो रही हैं…

← अलमारी पर लौटें, अगली कहानी पढ़ें

अपनी थीम चुनें

आपकी थीम पूरी साइट पर लागू होगी।