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हाथ में एक ग्रंथ

प्राचीन परिवेश में शिल्प और जनजीवन का उपन्यास

एक टहनी कितने की

कू वूजी · AI सृजन · 9462 अक्षर · लगभग 13 मिनट

साल के आखिरी दिनों में पश्चिमी बाज़ार में छत वाली एक छोटी जगह फिर खाली हो गई। जूते बेचने वाला काम समेटकर अपने गाँव जा रहा था और बाकी के कुछ दिनों के लिए जगह किसी और को देना चाहता था। गु छिंग वहाँ से गुज़री तो वह नीला परदा, जिसकी धुन कभी उसे हर दिन लगी रहती थी, ठीक सामने था। फिर भी वह नहीं रुकी। याओ की दुकान में जाने वाले फूल टोकरी में बँधे पड़े थे। श्याओमान गिनती के लिए उसके लौटने का इंतज़ार कर रही थी। पूर्वी बाज़ार की आठ टहनियाँ, फिर अठारह, और अगली खेप, जो अभी खाते में भी नहीं चढ़ी थी, उसके और उस जगह के बीच आ गई थीं जहाँ कोने को पुरानी ईंट से दबाया गया था।

वह ठेले के सामने से दो क़दम आगे निकल गई, फिर अचानक लौटकर पूछा कि सिर्फ़ आधे दिन के लिए लगाए तो कितना किराया होगा। जूते वाले ने कहा कि आधा दिन हो तो भी जगह पूरे दिन की है, कितनी देर बैठो, छह वन लगेंगे। गू छिंग ने फूलों की टोकरी हाथ में तौली। उसने छह वन को फ़ौरन घाटा नहीं माना। अपने पास रखे कुछ लाल मेइ और कैमेलिया के फूल निकाले और परदे के नीचे सजा दिए। वह याओ की दुकान की ओर से बेचने नहीं बैठी थी, न किसी से नमूना चुनवाने के इंतज़ार में थी। वह बस आधा दिन बैठकर देखना चाहती थी कि उसके फूल ख़रीदने वाले लोग आख़िर चाहते क्या हैं।

सबसे पहले अब भी वही आए जो सबसे सस्ते छोटे फूल ख़रीदते थे। दूसरों के लिए पानी ढोने वाली एक युवती देर तक फूल टटोलती रही और पूछा कि कुछ कम हो सकता है क्या। कू छिंग ने कहा कि दाम पहले ही लिखा है। उसका बोलना इतना याओ ल्याओ जैसा लगा कि ख़ुद सुनकर ठिठक गई। युवती ने हाथ वापस खींच लिया। बहस नहीं की और मुड़कर एक छ लंबी लाल डोरी ख़रीदने चली गई। कू छिंग उसे रोकना चाहती थी, मगर पीछे से दो और लोग आ गए। पूछने लगे कि पहनने पर कौन-सा फूल आसानी से दबेगा नहीं। काम में उलझकर वह बात कहने का मौक़ा हाथ से निकल गया।

आधे दिन में पाँच डालियाँ बिकीं और हाथ में चालीस वेन आए। ठेले की जगह का किराया निकालकर भी उतनी ही डालियाँ फूलों की दुकान को देने से ज़्यादा बचे। मगर बीच में जब वह रसोई के छप्पर तले एक घूँट गरम पानी माँगने गई, तो फूलों की टोकरी पड़ोस की कंघी बेचने वाली के भरोसे छोड़नी पड़ी। लौटकर उसे भी कुछ देर उसकी दुकान देखनी पड़ी। उसी बीच कोई फूल लेने आया तो सबसे सस्ती डाली की एक पंखुड़ी मुड़ चुकी थी। वह कंघीवाली से कह नहीं सकती थी कि उसने ढंग से ध्यान नहीं रखा, इसलिए खुद ही उसे सँवारने लगी। पहले रोज़ ऐसी छोटी बातें होती थीं। इधर घर पर बैठकर ऑर्डर का इंतज़ार करते-करते जैसे वह उन्हें भूल ही गई थी।

सलीके के कपड़े पहने एक ग्राहक कपड़े के सामने खड़ा हुआ। उसने कैमेलिया के बीच की पंखुड़ियों की सजीवता की तारीफ़ की और पूछा कि ये किस दुकान के हैं। गू छिंग ने कहा कि वह ख़ुद बनाती है। ग्राहक ने फिर पूछा कि उसकी कोई पक्की दुकान है या नहीं। उसने पीछे के उधार के नीले परदे की ओर इशारा किया, मगर बात आधी कहकर रुक गई। फिर कहा कि वह पश्चिमी फाटक की गली में रहती है और पूर्वी बाज़ार की ल्याओहुआजी दुकान को भी फूल देती है। दुकान का नाम सुनकर ग्राहक का चेहरा सहज हुआ। उसने एक फूल लिया और चला गया। आठ वन मुट्ठी में लिए गू छिंग ख़ुश तो थी, मगर उस हाथ को देखने का जी नहीं था जिससे उसने अभी-अभी दुकान की तरफ़ इशारा किया था।

घर लौटी तो श्याओमान भेजे जाने वाले फूल अलग कर चुकी थी। तय किए हुए आधे दिन से एक पहर का चौथाई हिस्सा ज़्यादा लग गया था। गू छिंग अभी मिले पैसे गिनने में लगी थी, उसने फ़ौरन ध्यान नहीं दिया। दादी चूल्हे के पास से एक कटोरा गरम पानी लाईं और बोलीं पहले हाथ धो लो, ठेले की धूल नए रेशम पर मत लगाना। उसने हामी भरी और श्याओमान से पूछा कि क्या कल भी थोड़ी देर आ सकती है। श्याओमान ने कहा कि साल की आखिरी शाम उसे घर जाकर भाप में केक पकाना है। रंगशाला में त्योहार पर किसी न किसी को रुकना पड़ता था, इस साल आखिर उसकी छुट्टी की बारी आई है।

गू छिंग ने सिर हिलाकर कहा, तो परसों सही। श्याओमान ज़रा हँसी और पूछा, परसों नए साल का पहला दिन नहीं है क्या? तब गू छिंग को समझ आया कि वह दिन भी अब फूलों की गिनती से तय करने लगी है। जल्दी से बोली कि वह उसे आने को मजबूर नहीं कर रही, बस यूँ ही पूछ लिया। श्याओमान ने बालों की पुरानी पिन कसकर दबाई और कहा, घर में कोई उसके लिए खाना बनाएगा, हर बार उनसे खाना गरम पर गरम करवाना भी ठीक नहीं। गू छिंग ने विरोध नहीं किया, पर अचानक उसे समझ नहीं आया कि पहले से गिने हुए फूल अब किन दिनों में बनाएगी कि समय पूरा पड़ जाए।

दोपहर में वह याओ की दुकान माल देने गई। दुकान में फूल बनाने वाली तीन स्त्रियों में से कुछ अपनी गठरियाँ बाँध चुकी थीं। काउंटर के पास याओ ल्याओ खुद थीं। उन्होंने दो कैमेलिया गू छिंग के सामने लौटाकर कहा कि लाते समय पंखुड़ियों के किनारे बँधाई में इतने कसकर दब गए कि खुलते नहीं। ग्राहक इन्हें नए साल पर पहनकर निकलें तो अगले दिन लौटते वक्त इनकी क्या हालत होगी, कौन जाने। गू छिंग ने डंडियों के नीचे पलटकर देखा। पहले श्याओमान की लपेट याद आई, फिर आखिरी बार अपनी लगाई कसने वाली डोरी का घेरा दिखा। उसे तुरंत समझ नहीं आया कि दबाव पहले कहाँ पड़ा था।

याओ ल्याओ ने बाकी फूल रोककर नहीं रखे। जो ठीक थे, उन्हें तय दाम पर रख लिया। बिगड़े हुए फूलों को दुरुस्त करने के बाद फिर देखना था। गु छिंग ने पूछा कि क्या इस साल भी दुकान को देने का दाम सिर्फ़ छह वेन रहेगा। याओ ल्याओ ने कहा कि वह अपनी दुकान लगाए तो जितना बिके, सब उसका है। लेकिन फूल इस दुकान में रखे जाएँ, तो हिसाब में सिर्फ़ बेचने का एक पल नहीं गिना जा सकता। उसने अपने बचाव में तीनों औरतों की मज़दूरी का उदाहरण फिर नहीं दिया। बस दराज़ से महीने के आखिरी दस दिनों की किराये की पर्ची निकाली, अभी लिए फूलों के डिब्बों की तह के नीचे दबाई और मुड़कर काउंटर के कोने में टेढ़े हो चुके फूल ठीक करने लगी।

गू छिंग ने भी उसका एक डिब्बा ठीक करने में हाथ बँटाया। हाथ के काम में निपुण होने से दोनों कुछ देर दाम की बात भूल गईं। याओ ल्याओ ने अचानक पूछा कि उसकी नई मददगार त्योहार पर कितने दिन छुट्टी लेगी। गू छिंग ने कहा कि अभी तय नहीं किया। याओ ल्याओ ने उसकी तरफ़ देखकर कहा कि जब उसने पहले साल किसी को काम पर रखा था, उसे भी लगता था कि त्योहार पर इतने ग्राहक आते हैं कि काम छोड़ना बड़ा नुक़सान है। फिर एक साल पहले महीने में उसकी एक कामगार के बेटे ने पहली बार ‘माँ’ कहा। वह घर पर नहीं थी। दुकान लौटी तो उसके मुँह से एक बात भी नहीं निकली। उसके बाद हर नववर्ष के पहले दिन याओ ल्याओ किसी और की छुट्टी को हल्के में लेने की हिम्मत नहीं कर सकी।

यह छोटी-सी घटना सुनकर गू छिंग को पहले लगा कि दुकान की मालकिन भी ऐसी बात कह सकती है। फिर डर लगा कि शायद वह इसी बहाने उसे कम माल देने को कह रही है। उसने मन ही मन उस बात के दो कारण खोज लिए और बात को अपनी मेज़ के पास टिकने ही नहीं दिया। घर लौटकर उसने लौटाए हुए दोनों फूल श्याओ मान को दे दिए और कहा कि डंडी की जड़ पर फिर कसकर लपेटना होगा, यह काम अभी नए काम में नहीं गिना जा सकता। श्याओ मान ने फूल लेकर पूछा कि डंडी ढीली हुई है या दबकर बिगड़ी है। गू छिंग ने कहा दोनों। पहले ठीक करके भेजो, ग्राहक उनकी जगह फ़र्क़ नहीं निकालेगा।

श्याओमान ने सिर झुकाकर धागे खोले, तब आख़िर देखा कि सबसे बाहरी घेरा बहुत कसकर बँधा था। यह पूरे फूलों का बंडल बाँधते समय जोड़ा गया था, उसने नहीं जोड़ा था। उसने गु छिंग को दिखाया, मगर गु छिंग दादी के साथ हाँड़ी उठाने जा रही थी। उसने बस कहा कि थोड़ी देर में देखूँगी। हाँड़ी रखने के बाद दोनों ने साथ देखा। गु छिंग फिर भी बोली कि भीतर की जड़ की गाँठ और समतल होती, तो बाहर का दबाव शायद इतना न बिगाड़ता। बात पूरी होते ही श्याओमान के हाथ रुक गए। काफ़ी देर बाद उसने फिर उधेड़ना शुरू किया।

उस दिन हिसाब चुकाते समय गू छिंग ने पहले नए काम के चार वन रखे, फिर दो वन और निकाले और दबी आवाज़ में कहा, “इस बार बाहर का घेरा मैंने बाँधा था, उसे ठीक करने के पैसे भी तुम्हें दूँगी।” श्याओ मान ने वे दो वन अलग रख लिए। उसने बारहवें महीने की पंद्रहवीं को अंदर की गाँठ सिखाने में हुई चूक के बावजूद काटे गए पुराने दो वन का ज़िक्र नहीं किया। दोनों सुधारे हुए फूल साथ लौटाते हुए उसने पूछा कि अगर वह नए साल के पहले महीने की तीसरी को आए, तो क्या नए काम की गिनती अलग से शुरू होगी। गू छिंग ने हाँ कहा। उसने यह भी कहा कि आगे माँग नियमित हो जाएगी, काम इन चंद हिस्सों तक सीमित नहीं रहेगा और मज़दूरी तय करना भी आसान होगा। श्याओ मान ने कहा कि वह पहले घर जाकर भाप में केक बनाएगी, घरवाले इंतज़ार कर रहे हैं। जाते हुए उसने मेज़ पर पड़े धागों के सिरे फिर भी समेट दिए। गू छिंग को यह कहने की कोई वजह नहीं दी कि इस लड़की का दिल छोटा है और काम भी ध्यान से नहीं करती।

वह जैकेट उसने उनतीस तारीख़ की दोपहर चुनी थी। सिले-सिलाए कपड़ों की दुकान में कई जैकेटें टँगी थीं। एक नरम थी, एक मोटी। मोटी वाली के गले पर गहरे रंग की पट्टी जड़ी थी और टँगी हुई वह नरम वाली से ज़्यादा सजीली दिखती थी। वह जानती थी कि दादी अक्सर बैठी रहती हैं और पहले नरम वाली लेना चाहती थी। दुकानदार ने कहा कि बाहर पहनकर निकलने पर इस वाली की शान दिखेगी, तो उसका हाथ उसी पट्टी पर ठहर गया। पैसे देते समय भी उसने सोचा कि आगे दादी पड़ोसियों के घर जाएँ तो लोग देख सकें कि पोती के फूल बनाने से कुछ आमदनी तो होती है।

दुकान के सहायक ने नाप पूछा तो उसने साथ लाई पुरानी रुईदार जैकेट से मिलाकर दिखाया। उसने सिर्फ़ कंधे और पीठ की लंबाई देखी, गले पर फिर ध्यान नहीं दिया। पुरानी जैकेट का गला दादी ने ख़ुद खोलकर बदला था और वह मूल गले से कुछ नीचा था। उसने पुरानी जैकेट फिर लपेटी तो भीतर लगा कपड़े का एक पैबंद दिख गया। उसने झट से उसे बाहरी तह से ढक दिया, जैसे डर हो कि कहीं उस पुराने रंग को देखकर लोग नई ख़रीदी जैकेट को भी कमतर न आँकें।

घर लौटते समय पुल के सिरे पर चोउ परिवार की छतरियों की कार्यशाला का दरवाज़ा आधा बंद हो चुका था। लू यिंग अभी गरम किए भात की देगची भीतर ले जा रही थीं और चोउ जीपिंग को बुला रही थीं कि उस टेढ़ी चिड़िया को छोड़कर पहले खा लो। गू छिंग ने दरवाज़े पर चिड़िया के पंख रगड़ने की हल्की आवाज़ सुनी। वह भीतर नहीं गई, बस गोद में दबाए रुई के कोट को थोड़ा और कस लिया। उसने कल्पना की कि उसे पहनकर दादी कैसी दिखेंगी। तस्वीर इतनी उजली थी कि उसमें गले के ठीक न बैठने की गुंजाइश लगभग नहीं थी।

नववर्ष की पूर्वसंध्या पर कू छिंग ने दादी को रुई भरी एक नई जैकेट दी। ज़्यादा महँगी नहीं थी, मगर गला पुराने से चौड़ा था। शन सू ने पहनकर देखा और कहा कि बैठकर काम करेगी तो गला ठोड़ी तक खिंचेगा। कू छिंग ने झट उसे मोड़कर ठीक करना चाहा और पूछा कि कहीं रंग बहुत गहरा तो नहीं। दादी ने कहा कि रंग पसंद है, गला बदलना पड़ेगा। उसका मन थोड़ा बुझ गया। ख़रीदते वक़्त सोचा था दादी देखते ही ख़ुश होंगी, उनके लिए एक काम और नहीं बढ़ना चाहिए था। जब दादी ख़ुद सुई लेकर गले की सिलाई खोलने लगीं, तब उसने सुई अपने हाथ में ली और कहा कि अभी आराम से ठीक करेंगे, किसी को पहनकर दिखाने की जल्दी नहीं है।

उन्होंने सादा-सा खाना खाया। बाहर कभी-कभार पटाखे बजते थे और वन परिवार में अब भी कोई अधबंद दक्षिणी फाटक की रखवाली कर रहा था। श्यू थान शहद में पगे फलों की एक तश्तरी लाई और गू छिंग ने बदले में अपने हाथ से भाप में पकाए केकों की एक पोटली दी। दोनों घरों के लोग दीवार के आर-पार बात करने लगे। अब गली के मुहाने तक सुनाने के लिए पहले की तरह चिल्लाना नहीं पड़ता था, मगर मेइ की महक महीने की शुरुआत जैसी गहरी भी नहीं रही थी। दादी ने पूछा कि कल सुबह रिश्तेदारों के यहाँ जाना है? गू छिंग बोली, पहले आराम करेंगी। उसने सोचा था कि आख़िर एक दिन होगा जब कोई फूलों के लिए जल्दी नहीं मचाएगा और वह चैन से रहेगी। सचमुच लेटी तो यही सोचती रही कि कहीं कोई डिब्बा ठीक से बंद करना रह तो नहीं गया।

नए साल के पहले दिन श्याओ मान सचमुच नहीं आई। वह छोटी चौकी खाली रही और गू छिंग को अपना हाथ बार-बार एक बार और बढ़ाना पड़ा। उसने पूरा दिन काम नहीं किया, बस दोबारा बनाए जाने वाले दोनों फूलों के जोड़ फिर से समेटे। दोपहर बाद दादी का गला बदल चुकी तो देखा कि पुराने गले के भीतर भी धागे की एक तह पहले कभी उधेड़कर फिर सिली गई थी। शन सू ने कहा कि कपड़ा कोई पहले पहन चुका है, उसकी गरमी में कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता। गू छिंग ने धागे का घेरा अंदर छिपा दिया। अब हर चीज़ को ऐसा दिखाने की उतावली नहीं थी जैसे पहली बार बनी हो और बिल्कुल नई हो।

तीसरी तारीख़ को वापसी की गाड़ी आई। लुओ यी ने किसी के हाथ बचे हुए एक सौ अड़सठ वन भेजे और साथ में आज़माए हुए सुगंधित काग़ज़ के दो छोटे टुकड़े। तारीफ़ में लंबा पत्र नहीं लिखा, बस कहा कि अठारहों डंडियाँ पूरी हैं, छह फूल अलग हो जाते हैं और मेज़ पर रखे हों तो दूर से भी पहचाने जाते हैं। गू छिंग ने पैसे कटोरे में उँडेल दिए। उनकी साफ़ खनक सुनकर अचानक उसका सचमुच मन हुआ कि पूरी गली सुन ले। उसने बचा हुआ नीला नमूना उठाकर दादी के पास खोंसा और बार-बार पूछा कि सुंदर है या नहीं। दादी का जवाब पूरा भी नहीं हुआ था कि उसकी अपनी हँसी रुकने का नाम नहीं ले रही थी।

श्याओमान आई तो ठीक उसी हँसी के बीच आ पहुँची। गु छिंग ने उसे लुओ यी का भेजा संदेश दिखाया। जहाँ छह फूल निकाल सकने की बात थी, वहाँ उँगली रखकर बोली, अच्छा हुआ तुमने याद दिलाया कि सबको एक साथ पक्का न सिल दूँ। श्याओमान भी ज़रा-सी हँसी। उसने कटोरा अंदर की ओर सरका दिया कि किसी के छूते ही सारे सिक्के ज़मीन पर न बिखर जाएँ। थोड़ी देर के लिए दोनों वैसी ही थीं जैसी उस दिन पुल पर साथ गीला कपड़ा उठाए थीं। उनके हाथों में ख़ुश होने के लिए एक ही बात थी और किसी ने उस पर कोई दूसरा हिसाब नहीं रखा।

मगर नए काम का बँटवारा शुरू हुआ तो गु छिंग ने श्याओमान के हिस्से की थालियाँ नए साल के बाद के कुछ दिनों में भी लगा दीं। श्याओमान ने देखकर कहा कि तीन तारीख को उसने सिर्फ़ आधे दिन आने का वादा किया था। दोपहर में उसे रंगाईघर लौटना है। गु छिंग ने सिर उठाकर कहा, क्या हमने नहीं कहा था कि आगे कुछ ज़्यादा समय दोगी। बात मुँह से निकलते ही कमरे की उस पल की खुशी जैसे कटोरे के किनारे से चुपचाप फिसल गई। श्याओमान ने उसे थामने की कोशिश नहीं की। बस अपने हिस्से की सामग्री के तीन ढेर ठीक से जुटाए, छोटी चौकी पर लौटकर बैठ गई और सिर झुकाकर वह काम करने लगी जो आज के लिए पहले ही तय था।

· अध्याय समाप्त ·

यह पुस्तक AI की सहायता से मौलिक रूप में लिखी गई है और वांग आनशी की 《梅花》(प्लम के फूल) तथा इस वेबसाइट की मूल लघुकथा 《不卖春风》(वसंत की हवा बिक्री के लिए नहीं) का विस्तार है। पात्र, व्यापार, भूगोल और कालगणना सभी काल्पनिक हैं; यह कवि की जीवनी नहीं है। मूल रचना में पेड़ बचाने, रेशमी फूलों में सुगंध न होने और दादा-दादी तथा पोते-पोती की दो पीढ़ियों के कमल देखने के केंद्रीय चुनाव बनाए रखे गए हैं।

इस पुस्तक की विषयसूची · 36 अध्याय
  1. ठंडी महक रेशम में नहीं
  2. सफ़ेद चूने से घिरी जगह
  3. चाँद के नीचे कैंची
  4. मेज़ पर रेशमी मेई
  5. दरवाज़े का मुँह दूसरी ओर
  6. सिक्कों की दो छोटी लड़ियाँ
  7. जगह देने वाला मोड़
  8. बिना महक का दुकान का नामपट्ट
  9. आधे दिन की मज़दूरी
  10. वह फूल जो फूल नहीं है
  11. बर्फ़ के बाद पेटी बाँधना
  12. एक टहनी कितने की
  13. किसी और के घर नए साल की रात
  14. फूलों का मौसम बीतने के बाद
  15. कागज़ पर नाम छापना
  16. ठंडे भात का एक कटोरा
  17. पहली बार दोबारा बनाने की इजाज़त नहीं
  18. लौटाया हुआ डिब्बा
  19. दो लोगों का आँगन
  20. बारिश का पानी पुरानी नाली से गुज़रता है
  21. श्याओमान का हिसाब
  22. छतरी के किनारे की खाली जगह
  23. ग्राहकों को जैसा वसंत चाहिए
  24. मेज़ पर छूटे फूल
  25. एक व्यक्ति की राह
  26. पाँचवाँ महीना कारोबार के हवाले नहीं
  27. फूल देखने वाले
  28. पैसों की तीसरी थैली
  29. गर्मियों में पेड़ का क्या होगा
  30. नाव पर चढ़ने से पहले
  31. जलमार्ग का पहला पड़ाव
  32. कमल के पत्ते अभी खुले नहीं हैं
  33. पानी के बीच का वह फूल
  34. लौटते समय फूलों के मौसम की जल्दी नहीं
  35. मेई के पेड़ की गर्मियों की छाँह
  36. फिर एक नई फूल-डाली बनाएँ

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